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२ जी घोटाला वास्तविक या काल्पनिक ?

Posted On: 22 Dec, 2017 Social Issues में

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लम्बे समय के बाद जिस तरह से २०१० की कैग रिपोर्ट में सामने आये २ जी घोटाले को लेकर सभी आरोपियों को विशेष अदालत ने सबूतों के अभाव में छोड़ दिया है वह देश की राजनीति, जाँच एजेंसियों अभियोजन और न्यायालय की सीमाओं पर गभीर सवाल पैदा करता है क्योंकि जिस घोटाले को देश का सबसे बड़ा प्रतीकात्मक घोटाला माना गया या जनता के सामने उसे इस तरह से प्रस्तुत किया गया जैसा उसके माध्यम से मनमोहन सिंह की सरकार ने देश को बड़े राजस्व की चोट दी है आज वह कहीं से भी कानूनी दलीलों के सामने टिक नहीं पाया ? आज देश की जनता यह सोच रही है कि जिस घोटाले को लेकर इतना बड़ा राजनैतिक तूफ़ान खड़ा किया गया था उसकी परिणिति इतनी हास्यास्पद होगी ? यह सही है कि नीतिगत समस्याओं के चलते या उन नीतियों के पीछे छिपकर अपने या सहयोगियों के लिए किसी तरह का लाभ उठाये जाने की कोशिशों का संदेह आज भी इस पूरे मामले से छंटता हुआ नहीं दिख रहा है फिर भी कहीं न कहीं से यह अवश्य दिख रहा है कि यह मामला आर्थिक घोटाले से अधिक राजनैतिक लाभ लेने का अधिक है.
जिस मामले को खुद पीएम के भाजपा उम्मीदवार होने के बाद से लगातार अपनी २०१४ की चुनावी सभाओं में उठाया जाता रहा था और पीएम मोदी के सत्ता सँभालने के साढ़े तीन साल बाद यदि उसकी यह स्थिति है कि देश की सर्वोच्च अभियोजक सीबीआई को किसी भी तरह के ऐसे सबूत नहीं मिले जिनके आधार पर न्यायालय उन्हें दोषी मानता तो इस मामले का स्तर आसानी से समझा जा सकता है. निश्चित तौर पर इतने सालों से चल रहे मामले में निश्चित तौर पर मोदी सरकार ने सब कुछ किया होगा पर आज जब सभी आरोपी सबूतों के आधार पर बरी कर दिए गए हैं तो इस मामले की वास्तविकता पर संदेह होने लगता है. जिस तरह के आंकड़े एकदम से बताये गए थे आज वे कहीं से भी किसी वित्तीय अनियमितता के चलते किये गए हों ऐसा साबित नहीं हो पाना आखिर देश के लिए किस तरह से सही कहा जा सकता है ? नीतिगत मामलों के चलते जिन कंपनियों का लाइसेंस रद्द कर दिया गया था और केवल उस समय स्पेक्ट्रम आवंटित होने के चलते लगभग सभी कंपनियों को भ्रष्टाचारी मान लिया गया था और सुप्रीम कोर्ट ने १२२ लइसेंस निरस्त भी कर दिए थे तो आज उन कंपनियों के लिए क्या सरकार माफ़ी मांगने को तैयार है ?
इस पूरे प्रकरण से यह बात तो स्पष्ट ही है कि कैग की एक रिपोर्ट में नीतिगत परिवर्तन न किया जाने के चलते एक अनुमान भर लगाया गया था जिसको भ्रष्टाचार का प्रतीक मान लिया गया और जिसके चलते ही कांग्रेस सत्ता से भ्रष्टाचारी के रूप में जनता के द्वारा सीमित संख्या में बाहर कर दी गयी पर सभी को यह भी नहीं भूलना चाहिए कि इस नीति के चलते देश में दूरसंचार क्रांति भी आयी थी जिसने हर भारतीय के हाथों तक संचार के आधुनिक स्वरुप को पहुँचाने का काम भी किया था. राजनीति अपनी जगह है पर केवल सत्ता पाने या दूसरे दल को नीचा दिखाने के लिए इस तरह के हथकंडों का दुरूपयोग करके अंत में देश की छवि को ही नुकसान पहुँचाया जाता रहा है. राजनैतिक दल और उनकी सत्ता अस्थायी होती है पर देश स्थायी है और जिस परिकल्पना के साथ देश में संसद की स्थापना की गयी थी अब केवल सत्ताधारी दल के निर्णयों और मंशा के स्थान पर संसद में सर्वानुमति की राजनीति पर ध्यान देने की आवश्यकता भी है क्योंकि जब सभी की सहमति से नीतियों का निर्धारण किया जायेगा तो देश आगे बढ़ पायेगा. निश्चित तौर पर सीबीआई और सरकार के पास अगली अदालत में जाने के विकल्प खुले हुए हैं पर जो सीबीआई पहले ही सबूत जुटाने में सफल नहीं हो पायी अब उसके जुटाए गए सबूत किस आधार पर न्यायालय में टिक पायेंगें यह सोचने का विषय है पर कांग्रेस को भ्रष्टाचारी साबित करने के लिए मोदी के लिए इस मामले को आगे बढ़ाना ही होगा अन्यथा गुजरात में सुधरे प्रदर्शन के चलते कांग्रेस मोदी पर पूरी क्षमता के साथ भजपाऔर मोदी पर पलटवार करने के लिए तैयार दिख रही है.



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