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रेलवे की आधारभूत आवश्यकताएं

Posted On: 30 Sep, 2017 Social Issues में

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मुंबई के एल्फिंस्टन-परेल स्टेशन के यात्री उपरिगामी सेतु पर हुए हादसे के बाद एक बार फिर से वही बातें दोहराए जाने का क्रम शुरू हो चुका है जिसके चलते पूरे देश में हज़ारों जाने जा चुकी हैं या फिर हर समय हज़ारों यात्री इस खतरे के साथ ही जीने को मजबूर हैं. यह सही है कि भारतीय रेल का पूरा नेटवर्क आज की आवश्यकता के अनुसार क्षमता को कहीं से भी पूरा नहीं कर पाता है जिससे थोड़ी सी बात पर अफवाह फैल जाती हैं और पलक झपकते ही कोई हादसा हमारी आँखों के सामने होता है. यह सही है कि दशकों पुराने ढांचे को सुधारने में समय तो लगना ही है पर १८५३ में भारतीय रेल के शुरू होने के बाद से आज तक भी तो रेल का परिचालन होता रहा है और उसकी आवश्यकता के अनुरूप सुधार भी किये जाते रहे हैं पर पिछले कुछ दशकों से इसमें किसी न किसी स्तर पर कमियां अवश्य ही दिखाई दे रही हैं जिसके चलते अब पूरे रेल नेटवर्क में रख-रखाव से जुडी समस्याएं सामने आने लगी हैं और यदि समय रहते इनसे नहीं निपटा गया तो आने वाले समय में रेलवे और रेल यात्रियों के लिए समस्याएं बढ़ती ही जाने वाली हैं. अब सरकार को इस क्षेत्र को प्राथमिकता देते हुए रेलवे के पेंच कसने की तरफ ध्यान देना ही होगा जिससे देश में यातायात के इस सुगम साधन को और भी सुरक्षित किया जा सके.
लम्बे समय तक लगातार उपयोग में आने के कारण रेलवे में रखरखाव सदैव ही एक बड़ी चुनौती रहा है जिसके चलते रेलवे के अधिकारियों की तरफ से भी कुछ लापरवाहियां की जाती रहती हैं कई बार धन की कमी का रोना भी रहता है पर इस सबमें सबसे बड़ी समस्या रेलवे के लिए समय के साथ बदलाव को न करते रहना भी है. रेलवे में हर एक अवस्थापना और संरचना की एक निश्चित आयु होती है जिसके चलते उसे उस समय से पहले ही बदलने की आवश्यकता पर ध्यान दिए जाने की ज़रूरत होती है कई बार काम के दबाव या रेल परिचालन में संभावित व्यवधान को देखते हुए इस कार्य को लम्बे समय तक टाल दिया जाता है और ट्रेनों तक को लम्बे समय तक समस्या वाले स्थानों से धीमी गति से निकाल कर काम चलाया जाता है. इस पूरी कवायद में जहाँ यात्रा का समय बढ़ता है वहीं आसपास के बड़े स्टेशनों पर अनावश्यक रूप से दबाव भी बनता है जो कि रेलवे के समयबद्ध और सुरक्षित परिचालन में एक बड़ा व्यवधान साबित होता है और इससे निपटने के लिए रेलवे के पास कोई स्पष्ट दिशा निर्देश नीति या कार्ययोजना का अभाव दिखाई देता है जिससे भी समस्याएं कम होने के स्थान पर बढ़ ही जाती हैं.
यदि आने वाले समय में रेलवे को देश के तेज़ी से बदलते हवाई यातायात से मुक़ाबला करना है तो उसे अपने आधारभूत कामों पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता पड़ने वाली है क्योंकि पीपीपी के आधार पर कोई भी निजी निवेशक केवल रेलवे की खाली पड़ी कीमती भूमि का उपयोग करने की दिशा में ही काम करने वाला है और उसका रेलवे की मूलभूत आवश्यकता से कोई सरोकार नहीं रहने वाला है तो उस परिस्थिति के लिए रेलवे को सीमित संख्या में निजी क्षेत्र को आमंत्रित करने की दिशा में सोचना चाहिए जिससे उसकी कीमती भूमि भविष्य में उसके विस्तार और अन्य परियोनाओं के लिए उपलब्ध रह सके. मुंबई हादसे के बाद रेल मंत्रालय को सबसे पहले पूरे देश में इस तरह के बड़े स्टेशनों पर मूलभूत संरचनाओं के बारे में एक श्वेत पत्र जारी कर यह बताना चाहिए कि आज इन स्टेशनों पर इनकी क्या स्थिति है और एक समय सारिणी के अनुरूप आने वाले दो या तीन वर्षों में इस तरह की समस्या से निपटने की कार्ययोजना पर अमल करना चाहिए जिसमें सबसे पहले यात्रियों की संख्या के अनुरूप बड़े स्टेशनों पर आवश्यक सुविधाओं को उपलब्ध कराया जाना चाहिए और उसके बाद उनके रख रखाव की समुचित व्यवस्था पर भी ध्यान देने के लिए एक मज़बूत और उत्तरदायी तंत्र बनाना चाहिए.
हर मंडल में इस तरह के काम को देखने के लिए एक विशेष अधिकारी की नियुक्ति की जानी चाहिए जिससे अन्य अधिकारी काम के बोझ के चलते इन कामों पर ध्यान न दिए जाना का बहाना न बना सकें और काम को समय से पूरा भी किया जा सके. रेलवे को मेट्रो रेलवे की तरह एक नयी टीम बनाने की दिशा में भी आगे बढ़ना ही होगा क्योंकि जब तक दक्ष और कार्यकुशल लोगों के हाथों में यह सब पूरी तरह से नहीं दिया जायेगा तब तक कुछ भी सही नहीं हो सकता है. इन्हीं परिस्थितियों में देश भर की मेट्रो रेलवे आखिर किस तरह से समयबद्ध होकर हर काम कर सकती हैं जबकि वहां पर गए अधिकांश कर्मचारी भी रेलवे से या उसकी धारणा के अनुसार ही होते हैं ? मतलब स्पष्ट है कि रेलवे में अभी उस तरह की कार्यसंस्कृति का विकास नहीं हो पाया है जैसा मेट्रो ने कम समय में विकसित कर लिया है और उसके चलते ही आज देश में स्थापित विभिन्न शहरों की मेट्रो अपने काम को समय से पूरा करने के लिए जानी जाती हैं.
अब समय आ गया है कि पूरी परिस्थिति पर ध्यान देते हुए एक विस्तृत कार्ययोजना बनायीं जाये और उसकी बागडोर ऐसे अधिकारियों के हाथों में होनी चाहिए जो आगामी दो या तीन वर्षों में रिटायर न हो रहे हों जिससे अधिकारियों को बीच में बदलने से काम प्रभावित न हो सके. जब इतनी अधिक उम्र में ई श्रीधरन अपने काम को सही समय से करने के लिए जाने जाते हैं तो यह सब काम करने वाले श्रीधरन जैसे और मेट्रो मैन हम सामने क्यों नहीं ला सकते हैं ? कहीं न कहीं इच्छा शक्ति में कमी के चलते ही यह सब नहीं हो पा रहा है और अब इस पर ध्यान देकर रेल यात्रा को सुरक्षित किये जाने का समय आ चुका है क्योंकि इसमें चूकने पर रेलवे के साथ सरकार और देश के नागरिकों के जीवन पर व्याप्त संकट को किसी भी तरह से कम नहीं किया जा सकता है.



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