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मोदी सरकार का मैनेजमेंट

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अपनी मेहनत और सहयोगी अमित शाह के भाजपा अध्यक्ष के रूप में साथ होने से पीएम मोदी ने जो कुछ भी हासिल किया है, उसके महत्व को पार्टी के सांसद और विधायक या तो समझते ही नहीं हैं या फिर वे यह समझते हैं कि पार्टी के सामने आने वाली हर चुनौती को भी मोदी-शाह की जोड़ी ही संभाल लेगी. लोकसभा में स्पष्ट बहुमत और राज्यसभा में मुद्दों आधारित मिलने वाले समर्थन के बाद भी संविधान के १२३वें संशोधन विधेयक पर जिस तरह की अव्यवस्था और लापरवाही भाजपा के सांसदों की तरफ से की गयी और विपक्ष अपने संशोधनों को पारित करने में सफल हो गया, उससे यही लगता है कि आज भी भाजपा के सांसदों में सदन की कार्यवाही को गंभीरता से लेने की आवश्यकता नहीं समझी जाती है.

कारण, इस विधेयक के लिए पहले से ही व्हिप भी जारी किया गया था, उसके बाद भी ८८ में से केवल ५४ वोट पड़ना सरकार और सांसदों की किस दिशा की तरफ संकेत करता है? हालाँकि यह एक महत्वपूर्ण संविधान संशोधन विधेयक था, जिसमें राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्ज़ा दिए जाने का प्रावधान किया जा रहा था. पर सदस्यों की संख्या और उनके चुनाव के बारे में विपक्ष ने अपने संशोधनों को पारित करवाकर सरकार के लिए समस्या खड़ी कर दी है. अब यह बिल इसी स्वरूप में पारित नहीं हो सकता है और सरकार को इसे नए सिरे से लोकसभा से पारित कराने के बाद राज्यसभा को भेजना होगा.
लोकतंत्र में संख्या बल पर महत्वपूर्ण विधेयक में संशोधन होना किसी भी सरकार के लिए असहज स्थिति पैदा कर देता है और यह विधेयक ऐसा है जिसके माध्यम से मोदी सरकार पिछड़े वर्ग में अपनी पैठ बढाने की कोशिशों में लगी हुई थी. पर इस तरह से इसके अटक जाने से अब इस मुद्दे पर व्यापक राजनीति किये जाने की संभावनाएं बढ़ गयी हैं और अपनी सुविधा के अनुरूप अब सरकार इसमें संशोधन करने के बाद फिर से पारित कराने की कोशिश कर सकती है.

इस मुद्दे पर जिस तरह से विपक्ष ने एक अल्पसंख्यक और एक महिला सदस्य को आयोग में रखे जाने के संशोधन को पारित करा दिया, उसके बाद अब सरकार को इस बारे में विचार तो करना ही होगा. क्योंकि सरकार की तरफ से महिलाओं और अल्पसंख्यकों के पिछड़ों का ध्यान रखने के मसले की इस विधेयक में उपेक्षा की गयी थी, जो अब विपक्ष ने सबके सामने लाकर सरकार को इसमें अपनी सुविधानुसार बदलाव करने के लिए बाध्य कर ही दिया है. क्योंकि अब यदि सरकार केवल संख्या बल पर मार्च तक प्रतीक्षा कर इस विधेयक को राज्यसभा में बहुमत मिलने तक लटकाती है, तो इसी स्वरूप में पारित होने से विपक्ष के पास एक सामाजिक लड़ाई लड़ने का हथियार उपलब्ध हो जायेगा कि सरकार महिलाओं और अल्पसंख्यकों के अधिकारों की बातों से पीछे हट रही है.
बहुमत व लगातार जीत के बीच भाजपा और मोदी सरकार की तरफ से विपक्ष के प्रति जिस तरह से उपेक्षा और वितृष्णा का भाव दिखाया जाता है, वह देश के लोकतंत्र के लिए कहीं से भी सुखद नहीं कहा जा सकता है. क्योंकि लोकतंत्र की मज़बूती और रक्षा के लिए सरकार और विपक्ष में मतभेदों के बाद भी देशहित के मुद्दों पर सहमति आवश्यक होती है. इससे कभी भी इनकार नहीं किया जा सकता है और मोदी सरकार के सौभाग्य से आज उसके सामने अधिकांश वही नीतियां लागू करने की चुनौतियाँ हैं, जो कभी कांग्रेस लागू करना चाहती थी. ऐसी परिस्थिति और पूर्व पीएम मनमोहन सिंह की कांग्रेस पार्टी में आर्थिक मुद्दों पर सुनी जाने वाली सभी बातों को लेकर आवश्यक संशोधन करने व देश की आर्थिक गति को आगे बढ़ाने का काम करना आसान ही है. पर सदन में सरकार के संसदीय कार्य मंत्रालय की तरफ से जिस तरह से काम किया जाता है, वह कहीं से भी उसके हितों के लिए अच्छा नहीं है.

अब भी समय है कि संसद के अंदर का माहौल ठीक करने के लिए भाजपा को सुषमा स्वराज जैसी नेता को यह मंत्रालय देने के बारे में सोचना चाहिए, जिनका लगभग सभी विपक्षी दलों से अच्छा सामंजस्य बना रहता है. इसका लाभ सदन के अंदर सरकार को मिल सकता है और विभिन्न मुद्दों पर विपक्ष के साथ सहमति बनाने की कोशिशों में भी लगातार सुधार दिखाई दे सकता है.



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