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बिहार, नीतीश और राजनीति

Posted On: 28 Jul, 2017 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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ModiNitish

तेजस्वी यादव के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले खुलने के बाद जिस तरह से बिहार के सीएम नीतीश कुमार ने बहुत आगे जाकर राज्य में तीन पार्टियों के महगठबंधन को तोड़ते हुए एनडीए में शामिल होने का फैसला किया, वह निश्चित रूप से बहुत लोगों को अखर रहा है. पर इसमें ऐसा कुछ भी नहीं है जिसको नैतिकता, विचारधारा या अन्य भारी भरकम शब्दों के माध्यम से तौला जाये. क्योंकि आज देश में राजनीति जिस स्तर पर पहुंची हुई है वहां विचारधारा, अंतरात्मा की आवाज़ आदि ऐसे शब्द बन चुके हैं, जिनका कोई मतलब नहीं रह गया है. २०१३ में मोदी को भाजपा की तरफ से पीएम का प्रत्याशी घोषित किये जाने के बाद एनडीए से बाहर निकलने वाले नीतीश कुमार ने जिस तरह से तीन वर्षों में ही एनडीए में वापसी की है, वह उनके लिए एक सोचा-समझा फैसला है. क्योंकि केंद्र में मोदी सरकार से संघर्ष की स्थिति बनाये रखकर वे राज्य की जनता की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतर पा रहे थे. वास्तविक रूप से आज देश में योजनाओं को राज्यों की सरकारों के दलों को देखकर ही निर्णय लिए जा रहे हैं और नीतीश अगले चुनावों में अपने को विकास में पिछड़ता हुआ सीएम नहीं घोषित करवाना चाहते थे. इसलिए तेजस्वी का मामला सामने आने पर उन्होंने आर-पार की लड़ाई लड़ने और महागठबंधन से बाहर जाने का निर्णय ले लिया, जो निश्चित रूप से उनकी राजनीति के लिए अच्छा ही साबित होने वाला है.
इस मामले में लालू और राजद का रवैया जिस तरह का रहा, उसको देखते हुए नीतीश की राह बहुत आसान हो गयी. क्योंकि जिस तरह से नीतीश भ्रष्टाचार के खिलाफ किसी भी लड़ाई में समझौता न करने की छवि के साथ राजनीति में हैं, उस परिस्थिति में लालू बिहार में सरकार में बने रहने के लिए तेजस्वी से त्यागपपात्र भी दिलवा सकते थे, जिससे एनडीए और अन्य दलों के हाथों से एक हथियार जाता रहता. पर संभवतः लालू अपनी आज की परिस्थिति को आंकने में कहीं न कहीं से बड़ी चूक कर ही गए, जिससे नीतीश ने बहुत ही शांतिपूर्वक एनडीए का दमन थाम लिया. कांग्रेस के पास बिहार में पाने और खोने के लिए बहुत कुछ नहीं था. पर आज की परिस्थिति में अब वहां एनडीए और यूपीए के दो बड़े गठबंधन ही बचे हुए हैं, जिससे आने वाले चुनावों में सीधे मुक़ाबले के आसार बढ़ गए हैं. ऐसी किसी भी परिस्थिति में अब लालू और कांग्रेस के लिए मोदी व नीतीश की छवि से लड़ना और भी कठिन काम होने वाला है. यदि इन दोनों दलों को अपनी प्रासंगिकता बनाये रखनी है और साथ ही जनता में अपनी स्वीकार्यता को बढ़ाना भी है तो निश्चित रूप से इन्हें जनता से जुड़े मुद्दों को आगे करके ज़मीनी वैचारिक लड़ाई को आगे बढ़ाना ही होगा.
आज बिहार में लालू की जूनियर बनी कांग्रेस के पास वहां कितने विकल्प शेष हैं, यह सोचने का समय आ गया है. क्योंकि लगभग हर राज्य में जनता के बीच स्वीकार्य नेताओं को भाजपा द्वारा अपनी तरफ शामिल किया जा रहा है और यह नीति २०१३ के समय से ही चल रही है. अब यह भी नहीं कहा जा सकता है कि ये सभी अवसरवादी नेता ही हैं. क्योंकि कई बार अपनी उपेक्षा और पार्टी में भविष्य न दिखाई देने पर भी लम्बे समय तक पार्टी से जुड़े हुए नेता भी कहीं न कहीं से खुद ही पार्टी से दूर होने लगते हैं और पार्टी के अंदर उनको मिल रहे इस वनवास को सत्ता के नज़दीक पहुंचाकर भाजपा उनकी राजनैतिक महत्वकांक्षाओं की पूर्ति का साधन बनती नज़र आती है. बिहार ने जो राह दिखाई है, वह कुछ अन्य राज्यों में गैर एनडीए दलों और कांग्रेस के लिए बड़ी चेतावनी भी हैं. क्योंकि आज विपक्ष में मोदी की प्रखर आलोचक ममता बनर्जी भी एक समय एनडीए का हिस्सा रह चुकी हैं और यदि उनके सामने भी बहुत विषम परिस्थितियां आती हैं, तो वे भी पहले के कुछ संपर्कों के माध्यम से फिर से एनडीए में जा सकती हैं, जिससे सम्पूर्ण विपक्ष की ज़िम्मेदारी केवल कांग्रेस पर ही आ सकती है. पर नेतृत्व की अनिच्छा के चलते वह अपने आज के रोल को सही ढंग से निभा पाने में विफल ही दिखाई देती है, जिससे एनडीए और मोदी का काम लगातार आसान होता जा रहा है.

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