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राष्ट्रपति चुनाव की राजनीति

Posted On: 23 Jun, 2017 Social Issues में

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अपने संख्या बल के आधार पर अपने प्रत्याशी को रायसीना हिल्स तक पहुँचाने की मज़बूत स्थिति में राजग के सामने विपक्ष की तरफ से कोई बड़ी चुनौती नहीं है क्योंकि इस चुनाव में अधिकांशतः सत्ता पक्ष अपने व्यक्ति को महत्वपूर्ण पद पर लाना चाहता है जिसे किसी भी तरह से गलत भी नहीं कहा जा सकता है क्योंकि देश के संवैधानिक मुखिया के पद पर बैठने वाले व्यक्ति और प्रधानमंत्री के बीच किसी भी तरह की अनबन या विवाद की ख़बरें सामने आती हैं तो वे दलीय लोकतंत्र और संसदीय व्यवस्था के लिए सुखद नहीं कही जा सकती हैं. इस पद का केवल शोभन महत्व होने के चलते ही देश के गणतंत्र बनने के बाद से हर सत्ताधारी दल अपने प्रत्याशी को चुनने में सभी संभव राजनैतिक समीकरणों को साधने के लिए प्रयासरत रहा करता है. वर्तमान में यदि भाजपा और मोदी सरकार इस पर के लिए कोविंद को सामने लायी हैं तो यह उनका पार्टी और राजग से जुड़ा हुआ मामला है उनके चुने गए प्रत्याशी पर किसी को भी सवाल उठाने का अधिकार नहीं है. आज देश में राजनीति का स्तर बहुत निम्न हो चुका है जिससे बचने का कोई समाधान नहीं है तथा सोशल मीडिया के बढ़ते चलन और नेताओं की हरकतों ने उन्हें पूरे देश में मज़ाक का विषय बना दिया है.
वैसे तो देश में पूर्ण बहुमत की सरकार है और कोई विशेष संकट भी दिखाई नहीं देता है पर क्या हमारे देश के नेताओं को अपने देश के राष्ट्रपति और भारतीय सेना के सर्वोच्च कमांडर को चुनने में कुछ और सावधानियां नहीं बरतनी चाहिए ? वैसे तो राष्ट्रपति मंत्रिमंडल की सलाह मानने को बाध्य होता है पर किसी विशेष परिस्थिति में उनकी भूमिका अचानक से बहुत बढ़ जाती है जैसे १९८४ में इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद देश के लिए नए प्रधानमंत्री को शपथ दिलाने का काम ज्ञानी जैल सिंह पर आ गया था और उन्होंने कांग्रेस की सलाह से राजीव गाँधी को इस पद की शपथ दिलाई थी ज़रा सोचिये उस या उसके जैसी किसी भी संकट कालीन परिस्थिति में किसी महत्वाकांक्षी व्यक्ति के राष्ट्रपति होने पर वह अपने किसी व्यक्ति को शपथ दिला सकता है क्योंकि जब उसको सलाह देने वाला पीएम ही नहीं होगा तो उस स्थति में उसके अधिकारों का दुरूपयोग संभव हो सकता है. अभी तक राष्ट्रपति पद पर सत्ताधारी दलों ने अपने सीनियर नेताओं को ही बिठाया है जिसमें से केवल डॉ कलाम एक अपवाद हैं क्योंकि उस समय अटल सरकार अपनी पसंद के किसी राजनैतिक व्यक्ति को राष्ट्रपति बनाने की स्थिति में नहीं थी तो उनका चुनाव सरकार की मंशा के अनुरूप राष्ट्रपति चुनने की सफल कोशिश कहा जा सकता है.
दुर्भाग्य है कि आज भी देश के राजनैतिक तंत्र को शीर्ष पदों के लिए जातीय गणित भी देखनी होती है क्योंकि समाज के हर वर्ग को हर राजनैतिक दल अपनी तरफ खींच कर अपने वोटबैंक में शामिल करना चाहता है तो उस स्थिति में इन शीर्ष पदों तक राजनीति से किसी भी तरह से परहेज़ नहीं किया जा सकता है. आज की भाजपा में अटल-आडवाणी-जोशी की राजनीति और उसका समर्थन करने वालों की संख्या नगण्य होती जा रही है और निजी कारणों से मोदी शाह की जोड़ी भी भाजपा की अंदरूनी राजनीति में अपने लिए आने वाले दशक तक कोई संकट न आने देने के लिए इनके प्रभाव को और भी कम करने में लगी हुई है. ऐसी परिस्थिति में कोविंद का राष्ट्रपति चुना जाना लगभग तय ही है क्योंकि भाजपा में बड़े स्तर पर कोई क्रॉस वोटिंग होगी इसकी सम्भावना न के बराबर है हाँ आडवाणी के घोर समर्थक कहीं कहीं पर भाजपा के प्रत्याशी को वोट देने से कतरा सकते हैं क्योंकि विपक्ष की तरफ मीरा कुमार को प्रत्याशी बनाये जाने से राजग के लिए यह चुनाव थोड़ा चुनौतीपूर्ण अवश्य हो गया है पर कोविंद के जीतने की पूरी सम्भावना है. भाजपा में आज कोई भी मोदी शाह के निर्णय के विरोध में नहीं बोल सकता है क्योंकि आडवाणी, जोशी, राजनाथ, सुषमा का हाल किसी से भी छिपा नहीं है इसलिए क्रॉस वोटिंग की आशा करना ही बेकार है हाँ भाजपा के सामूहिक नेतृत्व के आदी रहे नेताओं के लिए मोदी शाह का कांग्रेसी संस्कृति के अनुरूप काम करना चुभ तो रहा है पर वे कुछ भी करने कई स्थिति में नहीं है. इस चुनाव में कोविंद के लिए विपक्ष की तरफ से कोई खतरा नहीं है पर भाजपा में यदि भितरघात (जिसकी संभावनाएं बहुत कम हैं) होता है तो चुनाव पेचीदा हो सकता है.



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