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यूपी में कानून व्यवस्था

Posted On: 7 Jun, 2017 Social Issues में

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अखिलेश सरकार को कानून व्यवस्था पर सबसे ज़्यादा घेरने वाली भाजपा की यूपी में आदित्यनाथ के नेतृत्व में सरकार बनने के बाद जिस तरह से इस मोर्चे पर अभूतपूर्व सुधार की अपेक्षा जनता लगाए बैठी थी अभी तक के प्रारंभिक कार्यकाल से उसमे कोई गुणात्मक सुधार दिखाई नहीं दे रहा है हालाँकि अपने राजनैतिक जीवन में केवल सांसद रहे व्यक्ति के लिए इतने बड़े प्रदेश की बागडोर संभालना उतना आसान नहीं है जिसका सरकारी मशीनरी के साथ प्रशासनिक अनुभव लगभग शून्य ही है इसलिए इतने कम समय में उसकी समीक्षा किये जाने का कोई मतलब नहीं बनता है फिर भी जनता की तरफ से एक सवाल अवश्य ही सामने आता है कि पूर्ण बहुमत की सरकार बनने के बाद भी आखिर प्रदेश की पुलिसिंग में सुधार क्यों नहीं हो पा रहा है ? सीएम आदित्यनाथ ने निश्चित रूप से महंत अवैद्यनाथ की परंपरा को गोरक्षपीठ में बहुत कुशलता से आगे बढ़ाया है पर सरकारी अधिकारियों से निपटने और उनसे अपने अनुरूप काम लेने की प्रक्रिया समझने में उनको अभी भी लम्बा समय लगने वाला है. एक संस्था के प्रशासक के रूप में अर्जित अनुभव से निश्चित तौर पर उन्हें लाभ मिलने वाला है पर यदि भाजपा आपसी गुटबाज़ी छोड़ एकजुट होकर उनके साथ खड़ी हो तो इस कठिन मोर्चे को भी आसानी से जीता जा सकता है.
अखिलेश सरकार का कार्यकाल भले ही जनता को रास न आया हो और उनके स्थान पर उसने भाजपा को चुन लिया है पर प्रदेश की पुलिसिंग के लिए अखिलेश के पास जो मास्टर प्लान था और उस पर वे पूरी तैयारी के साथ आगे बढ़ भी रहे थे आज उसे और भी तेज़ी से आगे बढ़ाने की आवश्यकता है क्योंकि डायल १०० कि परिकल्पना को यूपी जैसे बड़े राज्य में यदि धरती पर उतारा जा सके तो पूरे प्रदेश की कानून व्यवस्था में गुणात्मक सुधार आसानी से दिखाई देने लगेगा. आज जो समस्या सामने दिख रही है वह सीएम आदित्यनाथ कि अनुभवहीनता से अधिक उन पर केन्दीय नियंत्रण के कारण भी हो सकती है क्योंकि जिस तरह से पिछली सरकार में नगर या गांव के किसी भी सपा नेता के कहने पर भी पुलिस अधिकारियों के तबादले हो जाया करते थे उस पर इस सरकार ने रोक तो लगाई है पर आज जिस तरह से बड़े और प्रभावशाली नेताओं के चुनावी क्षेत्रों में उनकी मनमानी आसानी से चल रही है पर अन्य जगहों पर अधिकांश पहली बार चुने गए विधायक सीएम तक अपनी बात पहुँचाने से भी डर रहे हैं जिससे एक सिपाही तक को इस बात का एहसास हो गया है कि ये नेता चाहकर भी उनका तबादला नहीं करवा सकते हैं इसलिए वे मनमानी करने पर उतारू हो चुके हैं. भाजपा के पास व्यापक संगठन और निष्ठावान कार्यकर्ताओं की बड़ी संख्या है फिर भी जिस तरह से पार्टी में इतने दिनों बाद सरकार बनने पर दल बदलुओं को अधिक भाव दिए जा रहे हैं उससे भी पार्टी के समर्पित कार्यकर्ताओं में असंतोष बढ़ रहा है. भाजपा के वोट बैंक रहे अगड़े हिन्दुओं को भी अब यह लगने लगा है कि भले ही समरसता की कितनी बातें की जा रही हों पर आज की भाजपा में पिछड़ों और अन्य वर्गों का बोलबाला हो चुका है जिस पर वे भी अनमने ढंग से प्रतिक्रिया देते हुए देखे जा सकते हैं.
प्रदेश के सीएम का सपना देख रहे अन्य भाजपा नेताओं के लिए आज का समय कठिन हो चुका है तो यह भी संभव है कि सरकार और सीएम के नियंत्रण को कमज़ोर दिखाने के लिए अन्य नेताओं के समर्थक इस तरह की हरकतें करने में लगे हैं जिससे भाजपा कार्यकर्त्ता होने के चलते पुलिस उन पर सीधे तौर पर हाथ भी न डाल पाए और वे अपने उद्देश्य में सफल भी हो जाएँ ? भाजपा में सभी जानते हैं कि यदि सफल सीएम के रूप में आदित्यनाथ ने अपने को यूपी में स्थापित कर लिया तो आने वाले समय में यूपी में भाजपा के बहुमत में आने पर उनको हटा पाना असंभव होगा और वे पीएम मोदी के बाद स्वाभाविक रूप से उनके उत्तराधिकारी बन कर केंद्रीय नेताओं के लिए भी कड़ी चुनौती प्रस्तुत कर देंगें. आज कड़े सन्देश के बाद भी जिस तरह की चुनौतियाँ सीएम के रूप में आदित्यनाथ के सामने आ रही हैं उनका निश्चित रूप से विपक्षी दलों से अधिक भाजपा से ही सम्बन्ध है तभी चाहकर भी पुलिस कार्यवाही नहीं कर पा रही है और इस तरह के तत्व प्रदेश में लगातार कुछ न कुछ करते ही जा रहे हैं. सीएम आदित्यनाथ और भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व को यूपी की वास्तविक स्थिति और गंभीरता को समझते हुए एक पूर्णकालिक गृह मंत्री की आवश्यकता पर विचार करना चाहिए क्योंकि अच्छी मंशा होने के बाद भी अपनी सीएम के पद से जुडी व्यस्तताओं के चलते आदित्यनाथ के पास गृह मंत्रालय देखने का उतना समय नहीं होगा जितने की यूपी को आवश्यकता है तो उस स्थिति में पूरा गृह मंत्रालय अधिकारियों के हाथों में ही रहेगा जिसका दुष्प्रभाव लगातार दिखाई देता रहेगा. यूपी जैसे विशाल राज्य में बड़े शहरों में पुलिस आयुक्त प्रणाली अविलम्ब लागू करने की आवश्यकता है साथ ही राजनैतिक स्तर पर पूरी समस्या से निपटने के लिए एक अनुभवी गृह मंत्री और उसके आधीन काम करने वाले दो युवा गृह राज्य मंत्रियों कि नियुक्ति भी की जानी चाहिए जिनके पास स्पष्ट रूप से प्रदेश के पूर्वी और पश्चिमी भाग की ज़िम्मेदारी हो साथ ही गृह मंत्री आतंक से जुड़े मुद्दों को सीधे अपने स्तर से देखना शुरू करें.



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