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ईवीएम - आरोप और तथ्य

Posted On: 15 Mar, 2017 टेक्नोलोजी टी टी में

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पांच राज्यों में हुए चुनावों के रुझान और नतीजे आने के साथ ही जिस तरह से बसपा अध्यक्ष मायावती ने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) के माध्यम से चुनावों में हेर-फेर करने के आरोप लगाने शुरू कर दिए उसके बाद उनके वोटर्स और कुछ अन्य आम लोगों के मन में यह सवाल भी उठने शुरू हुए कि क्या ईवीएम के साथ कोई दल चुनाव परिणामों को अपने पक्ष में करवा सकता है ? इसके लिए सबसे पहले हमें इन मशीनों की संरचना को समझना होगा क्योंकि वोट डालने वाले सभी लोगों ने वोटिंग मशीन और उससे जुडी हुई कण्ट्रोल यूनिट को मतदान के समय अवश्य देखा होगा. जिस मशीन में हम अपनी पसंद के उम्मीदवार का चयन करने के लिए उपयोग में लाते हैं वह वोटिंग यूनिट और जो पीठासीन अधिकारी के पास होती है उसे कण्ट्रोल यूनिट कहा जाता है. हर वोटिंग मशीन में अधिकतम १६ प्रत्याशियों के लिए स्थान होता है और वोटिंग मशीन की इस व्यवस्था से अधिकतम ४ यूनिट समानांतर लगाकर ६४ प्रत्याशियों के लिए व्यवस्था की जा सकती है इससे अधिक प्रत्याशी होने पर मतपर्तों द्वारा चुनाव कराना अपरिहार्य हो जायेगा. हर निर्वाचन क्षेत्र के उम्मीदवारों के अनुरूप इन मशीनों की प्रोग्रामिंग की जाती है तथा आज उपयोग में लायी जाने वाली इन मशीनों की वोट रिकॉर्ड करने की अधिकतम सीमा ३८४० मतों की है परंतु अधिकांश बूथों पर केवल १५०० वोटर ही होते हैं जिससे क्षमता संबंधी समस्या कभी भी सामने नहीं आ सकती है. एक समय होने वाली बूथ कैप्चरिंग की घटनाओं को ईवीएम ने पूरी तरह से समाप्त ही कर दिया है क्योंकि इनकी व्यवस्था और कार्यप्रणाली कुछ इस तरह की है कि बहुत कोशिश करने के बाद भी एक मिनट में ५ से अधिक वोट नहीं डाले जा सकते हैं यह भी तब संभव है जब पीठासीन अधिकारी भी मिला हुआ है वर्ना अधिकारी के कंट्रोल यूनिट में क्लोज बटन दबाते ही नए वोटों को डालने की प्रक्रिया स्वतः ही बंद हो जाएगी.
मतदान की यह पूरी प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है इसके बारे में भी समझना आवश्यक है क्योंकि सुबह मतदान शुरू करने से पहले आयोग की तरफ से न्यूनतम ५० वोट का मॉक पोल कराने का निर्देश भी दिया जाता है जिसमें सभी प्रत्याशियों के एजेंट शामिल किये जाते हैं और उनके सामने ही कण्ट्रोल यूनिट पर कुल पड़े वोट और उनकी गणना की जाती है तथा मशीन द्वारा सही तरह से काम करने की स्थिति को जांच जाता है जिसके बाद मशीन को फिर से न्यूट्रल करके सील किया जाता है और मतदान प्रारम्भ कराया जाता है. इस पूरी प्रकिया के बीच सेक्टर प्रभारी और अन्य तरह के प्रशासनिक और चुनाव आयोग से जुड़े अधिकारी निरंतर दौरा करते रहते हैं जिससे कहीं भी किसी भी अनियमितता की स्थिति में उसे त्वरित रूप से रोका जा सके. जब हर मतदान केंद्र पर हर प्रत्याशी के एजेंट मौजूद रहते हैं और साथ ही प्रत्याशी खुद भी अपने स्तर से बूथ के बाहर पूरी चौकसी रखते हैं तो किसी भी गड़बड़ी को आखिर किस तरह से किया जा सकता है ? इस सबके बाद भी पूरे चुनाव में किसी भी एजेंट की तरफ से मशीन की कार्यप्रणाली पर कोई संदेह व्यक्त नहीं किया गया और वोटर्स ने भी किसी भी स्तर पर कोई शिकायत दर्ज नहीं कराई तो इस तरह के आरोपों को हताशा की उपज ही माना जा सकता है.
वोटिंग मशीन में मतदान के बाद जब एजेंट्स की उपस्थिति में पीठासीन अधिकारी क्लोज बटन दबा देता है तो उसके बाद रिकॉर्डिंग यूनिट में लगी चिप से बिना किसी छेड़छाड़ के ब्यौरे में परिवर्तन नहीं किया जा सकता है और यह चिप आयात करने के समय से ही सील होती है इसके साथ किसी भी तरह की छेड़खानी करने से इसमें रिकॉर्ड डाटा खुद ही नष्ट हो जाता है जिससे बाद में काउंटिंग के समय इसमें कुछ भी नहीं मिलेगा तो किसी के द्वारा ऐसे प्रयास ही कैसे किये जा सकते हैं. जिन स्ट्रांग रूम्स में ये मशीनें रखी जाती हैं वहां पर कई स्तरीय सुरक्षा की जाती है और सील कमरों के बाहर प्रत्याशी भी अपने ताले वहां पर लगा सकते हैं जिसके लिए आयोग ने उन्हें अधिकार दे रखे हैं पर अधिकांश मामलों में प्रत्याशी सुरक्षा से संतुष्ट होते हैं. इन मशीनों में रिकॉर्ड किये गए ब्यौरे को १० वर्षों तक सुरक्षित रखा जा सकता है हालाँकि ऐसी आवश्यकता नहीं पड़ती है. मतदान के पश्चात् मशीनों को ऑफ करके बैटरी निकाल ली जाती है जिसे काउंटिंग के दिन फिर से लगाया जाता है जिससे लंबी चुनावी प्रक्रिया के दौरान बैटरी सम्बंधित किसी भी समस्या से मशीन और रेकॉर्ड्स को नुकसान न पहुँच सके. फिर भी किसी संदिग्ध परिस्थिति में कोई समस्या आने पर उस मशीन या क्षेत्र से जुड़े मतदान को दोबारा कराने जाने का विकल्प आयोग के पास सदैव ही सुरक्षित रहता है.
अब इस परिस्थिति में ईवीएम से हुए मतदान पर संदेह करने वालों की मानसिक स्थिति को समझना आवश्यक भी है क्योंकि २००९ के आम चुनावों में हार के बाद भाजपा के नेताओं लाल कृष्ण आडवाणी और सुब्रह्मण्यम स्वामी ने भी मायावती की तरह ही इस तरह के आरोप लगाए थे और मतदान को मतपत्रों के माध्यम से मतदान कराये जाने की मांग भी की थी. इसका सीधा सा मतलब यही है कि ७० साल के लोकतंत्र में अभी भी देश के कुछ नेता इतने परिपक्व नहीं हुए हैं कि वे जनता के अपने विरोध में जाने को आसानी से स्वीकार कर सकें ? उन सभी नेताओं को अपनी नीतियों और उन कारणों पर विचार करना चाहिए जिनके चलते जनता ने उन्हें इन वोटिंग मशीनों के माध्यम से नकार दिया है और अगर वे अब भी नहीं सुधरे तो उनके लिए भविष्य में बचे रह पाना भी संभव नहीं हो पायेगा. अपनी कमज़ोरियों का ठीकरा इन मशीनों पर फोड़ने से कुछ भी हासिल नहीं होने वाला है क्योंकि इन्हीं मशीनों ने कभी लाल कृष्ण आडवाणी को उप प्रधानमंत्री तथा खुद मायावती को यूपी का मुख्यमंत्री भी बनवाया था. यह लोकतंत्र की खूबसूरती है कि सत्ता परिवर्तन इतनी शांति के साथ हो जाया करते हैं इसलिए लोकतंत्र की मूल भावना को समझना आवश्यक है और अपनी हताशा को व्यक्त करने के स्थान पर अपने अंदर कमियों को खोजने के बारे में सोचना चाहिए जिससे लोकतंत्र को और भी मज़बूत किया जा सके.



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