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चुनाव सुधार की तरफ

Posted On: 8 Feb, 2017 Social Issues में

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केंद्र सरकार की तरफ से चुनाव सुधारों पर कुछ पहल करते हुए जिस तरह से लोकसभा और राज्यों के विधान सभा चुनावों के एक साथ कराने की बात कही जा रही है उससे निश्चित तौर पर देश के धन को बचाने में मदद मिलेगी पर क्या भारत जैसे जीवंत लोकतंत्र में इस तरह की किसी गतिविधि से केंद्र में शासन कर रहा दल निरंकुश नहीं हो सकता है ? आज की परिस्थिति में चूंकि कहीं न कहीं किसी राज्य में प्रतिवर्ष चुनाव होते रहते है तो उनके कारण कुछ कदम उठाने से पहले सरकारों को सोचना भी पड़ता है पर जब यह सब पूरी तरह से ख़त्म हो जायेगा तो सरकारों पर किसी भी तरह का अंकुश नहीं रहेगा और स्पष्ट जनादेश को कुछ भी करने की मनमानी वाली व्याख्या के साथ राजनैतिक दल देश के लिए कभी भी बड़ी समस्या खड़ी कर सकते हैं जिससे किसी भी स्तर पर लोकतंत्र को मज़बूत नहीं किया जा सकेगा. इसके साथ ही किसी भी राज्य में राजनैतिक अस्थिरता आने पर क्या वहां की सरकार को भंग कर राष्ट्रपति शासन के माध्यम से कमान केंद्र को सौंप दी जाएगी या दलों के विधायकों की संख्या के आधार पर एक प्रादेशिक सरकार बना दी जाएगी जो अगले चुनाव तक सामान्य शासन चलाने के लिए अधिकृत होगी ? खर्च बचाने के लिए जिस तरह के बेतुके तर्क आज सामने आ रहे हैं तो क्या सरकार चला रहे दलों और उनके नेताओं से यह सवाल भी नहीं पूछा जाना चाहिए कि जनता के पैसों को वे राज्यों में घूमकर क्यों बर्बाद करते रहते हैं ? क्या वे देश को डिजिटल करने के साथ अपने घूमने फिरने पर होने वाले खर्च को रोकने के लिए तत्पर हैं क्योंकि देखा जाये तो अधिकांश बर्बादी हमारे नेताओं की तरफ से होती रहती है.
किसी भी तरह के सुधार से पहले देश को शत प्रतिशत मतदान सुनिश्चित करने के बारे में अधिक ध्यान लगाना होगा जिसके लिए डिजिटल मंच का उपयोग विभिन्न परीक्षणों के बाद किया जा सकता है. जो लोग डिजिटल तरीके से अपने वोट को देना चाहते हों उनकी वोटर पहचान संख्या को सबसे पहले आधार से जोड़ने का काम किया जाना चाहिए जिससे उनकी पहचान के बारे में सुनिश्चित हुआ जा सके इसके बाद जिन क्षेत्रों में चुनाव हो रहा है उनकी वोटिंग मशीन के अंतिम प्रारूप को चुनाव सम्बंधित आयोग की वेबसाइट पर प्रदर्शित किया जाना चाहिए. जो भी मतदाता डिजिटल माध्यम से अपने वोट को डालना चाहते हैं उनको मतदान से पहले एक सन्देश के माध्यम से पंजीकरण कि सुविधा देनी चाहिए तथा मतदान शुरू होने के बाद मतदाता को फिर से अपने चुनाव क्षेत्र के पेज पर जाकर अपनी जानकारी भरनी हो जिसके बाद एक ओटीपी सन्देश मतदाता के मोबाइल पर आये जिसे समुचित स्थान पर भरकर मतदाता अंतिम रूप से अपने वोट को देने का पात्र बन सके. इस तरह से मिलने वाले सभी वोटों को नेट पर ही सुरक्षित रखे जाने के साथ ही भविष्य में वोटिंग मशीनों को भी नेट से जोड़ना अनिवार्य किया जाना चाहिए जिससे सारे वोट एक साथ में जोड़े जा सकें और मशीनों को भी सिंक्रोनाइज़ किया जा सके. इसके बाद मतगणना केंद्रों पर एजेंटों कि उपस्थिति में यह सारा काम करने के बाद परिणाम जानने की तरफ बढ़ना चाहिए. इस पूरी व्यवस्था से जहाँ सरकार के संसाधनों को कम किया जा सकता है वहीं भीड़ के कारण मतदान का प्रतिशत कम होने की समस्या से भी निपटा जा सकता है क्योंकि आज बहुत से मतदाता भीड़ के चलते भी वोट डालने से परहेज़ कर जाते हैं.
ऐसी परिस्थिति में क्या चुनावों को भी राष्ट्रीयकृत करने सरकार की तरफ से चुनावी खर्च दिए जाने की बातें नहीं होनी चाहिए ? क्या देश में धर्म और जातियों पर आधारित हो चुकी हमारी राजनैतिक व्यवस्था को भी इस मसले के साथ ही हल किये जाने की आवश्यकता नहीं है ? हमारे चुनाव सुधारों में कुछ ऐसे प्रयास भी होने चाहिए कि विभिन्न राजनैतिक दल केवल पार्टी के नाम पर ही वोट मांग सकें हालाँकि भारत जैसे विविधता वाले देश में यह बहुत ही कठिन काम साबित होने वाला है फिर भी यदि प्रयास किये जाएँ तो कुछ भी कठिन नहीं है. आज टिकट वितरण से लगाकर सीएम और मंत्रियों के चुनाव तक में भी जातीय, क्षेत्रीय और धार्मिक आधार पर विचार करना एक मजबूरी सी बन गयी है और सभी राजनैतिक दल इस समस्या को खड़ी करने के बाद अब इससे जूझते ही नज़र आते हैं जिससे जातीय और धार्मिक आधार पर बनती हुई जनता को भी सही विकल्प नहीं मिल पाते हैं और कई बार दलीय निष्ठा के चलते बहुत बुरे विकल्प जनता के सामने चुनाव में दिखाई देने लगते हैं. चुनाव आयोग और संसद को इस मसले पर गंभीरता से विचार करना ही होगा तभी राजनीति के नाम पर जो सामाजिक विद्वेष लगातार बढ़ाया जाता है उस पर अंकुश लगाया जा सकता है साथ ही चुनावी माहौल में बढ़ती हुई कटुता को भी कम किया जा सकता है.
देश के लिए समग्र नीति नेताओं के स्थान पर विशेषज्ञों से बनवाने को प्राथमिकता दी जानी चाहिए क्योंकि एक बार जब हमारे लिए दीर्घावधि की योजनाएं बन जाएंगीं तो उन पर चलना लगभग हर सरकार की मजबूरी ही हो जायेगा इन दीर्घ कालीन नीतियों में बदलाव के लिए संसद के २/३ बहुमत की आवश्यकता भी अनिवार्य की जानी चाहिए जिससे अच्छी नीतियों को केवल विरोध के कारण कोई भी राजनैतिक दल अनावश्यक रूप से रोक न सके. क्या हमारे नेता इस मसले पर भी एक मत नहीं हैं कि देश के लिए क्या आवश्यक है और क्या प्राथमिकताएं होनी चाहिए क्योंकि जब तक हम लंबे काल के लिए सोचना शुरू नहीं करेंगें दलीय प्रतिबद्धताएं हमारे हर क्षेत्र में बाधाएं खड़ी करती रहने वाली हैं. चुनाव पूरी तरह बिना अनाप-शनाप खर्च के संपन्न होना चाहिए और इसमें आयोग को भी तकनीक का अधिक उपयोग करते हुए सुरक्षा बलों और अन्य मदों में होने वाले खर्चों को रोकने की कोशिश करने में विधायिका को पूरी मदद भी देनी चाहिए जिससे देश में आदर्श रूप से चुनाव कराये जाने की परिस्थितियों को लाया जा सके.



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