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काले धन के स्वरुप

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देश के अंदर प्रवाहित होने वाले काले धन पर प्रभावी रोक लगाने के लिए अब सरकार को इनकम टैक्स के साथ अन्य टैक्स सुधारों पर भी आज की मंहगाई की दरों के अनुरूप काम करना ही होगा वर्ना समय के साथ एक बार फिर से १९४८, १९६० और १९६८ में नोट बंद करने की गयी कवायद की तरह २०१६ के नोट बंद होने के बाद पाकिस्तान से आये नकली नोट और टैक्स चोरी वाली काले धन की समानांतर अर्थव्यवस्था के खड़े होने में देर नहीं लगेगी। देश में काफी सुधारात्मक प्रयासों के बाद भी मोदी सरकार रेटिंग एजेंसियों को यह भरोसा दिला पाने में नाकाम रही है कि देश में आर्थिक गतिविधियां सही रास्ते पर हैं जिससे देश की रेटिंग में अपेक्षित सुधार नहीं दिखाई दिया है जिस पर खुद पीएम मोदी ने अधिकारियों से सभी सम्बंधित विभागों की रिपोर्ट मांगी है। आज भी सरकारी खर्च को कम करना सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती बना हुआ है और जब तक इसमें सफलता नहीं मिलती तब तक स्थितियां सुधरने वाली नहीं हैं। सरकार को भी यह समझना होगा कि विनिवेश भारतीय परिस्थितियों में अल्पकालिक उपाय ही हो सकता है पर वह सरकार के खर्चों को कम करने का साधन नहीं बन सकता है।
काले धन को कृषि के माध्यम से कुछ हद तक स्वीकार्य बनाये जाने की कोशशें भी देश में शुरू हो चुकी हैं इसलिए अब सरकार के लिए नयी तरह की चुनौतियाँ भी सामने आने वाली हैं क्योंकि बड़े किसानों के रूप में अब वे लोग भी सक्रिय होने लगे हैं जिनका कृषि से कोई मतलब कभी भी नहीं रहा है. कृषि योग्य आये के करमुक्त होने के कारण वे अब कृषि भूमि में निवेश करने लगे हैं तथा उससे होने वाली आय को अपनी आयकर विवरणी में दिखाकर काले धन के कुछ हिस्से को कानून सम्मत बनाने के प्रयास करते हुए दिखाई देने लगे हैं.इस समस्या से निपटने के लिए सरकार को कृषि क्षेत्र में भी कुछ सुधार करने की आवश्यकता है क्योंकि जब तब बड़े किसानों के रूप में काले धन वालों पर यहाँ भी कोई नियंत्रण नहीं लगाया जायेगा तब तक इस तरह की छोटी गतिविधियों से भी अर्थव्यवस्था में व्यापक सुधार लाने में अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकती है. निश्चित तौर पर सरकार की नज़र हर ऐसे क्षेत्र पर है जिससे काले धन को कानूनन सम्मत बनाने की गतिविधयों का सञ्चालन किया जा सकता है पर अब हमें खुद ज़िम्मेदार नागरिक के रूप में आगे बढ़कर स्वयं को सुधारना होगा.
हर सुधार की अपेक्षा केवल सरकार से करने की मानसिकता से भी अब देश को बाहर आना ही होगा क्योंकि देश केवल सरकार चला रहे लोगों का ही नहीं होता है उसमें बड़ा योगदान आम जनता का होता है सरकारें और नेतृत्व तो बदलते रहते हैं पर हमें अपने पूरे जीवन में एक जैसी परिस्थितियों में ही रहना होता है. देश का आम नागरिक टैक्स चोरी करने में लिप्त नहीं होना चाहता है अब अगर सरकार करों के ढांचे में आज की आवश्यकता के अनुरूप सुधार कर पाने में सफल हो तो उसके टैक्स में बदले ही पहले कुछ सालों में कुछ कमी दिखायी दे पर आने वाले समय में टैक्स देने वालों की संख्या में बढ़ोत्तरी होने से कर संग्रह अभूतपूर्व तरीके से बढ़ सकता है. सरकारी पारदर्शिता को और भी अधिक जवाबदेह और कारगर बनाने से जहाँ एक तरफ आम लोगों का भरोसा सरकार में बढ़ सकता है वहीं उसके आह्वाहन पर जनता की तरफ से सकारात्मक रुझान भी दिखाई दे सकता है. शिक्षा को सस्ता करने की दिशा में भी कदम उठाये जाने के बाद ही लोगों में भ्रष्टाचार करने की मानसिकता को कम किया जा सकता है क्योंकि शिक्षा का बाज़ारीकरण हो जाने से आज हर अभिभावक अपने बच्चों की शिक्षा के लिए चिंतित दिखाई देता है. अब समय आ गया है कि हर बात में सरकार की तरफ ताकने के स्थान पर हम नागरिक खुद भी अपने स्तर से देश के लिए सही कार्यों में रूचि लेना प्रारम्भ करने जिससे भविष्य में किसी सरकार को इतना बड़ा और कडा निर्णय न लेना पड़े.



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