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मीडिया और सरकार-२

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सरकार द्वारा जिस तरह से अचानक उठाये गए कदम से जहाँ सीमित लोगों के बीच लोकप्रिय एनडीटीवी चैनेल को अपनी टीआरपी बढ़ाने में मदद मिली वहीं एक बात और भी स्पष्ट हो गयी है कि मोदी सरकार में कुछ लोग ऐसे काम करने पर आमादा हैं जिससे सरकार की छवि को आसानी से संदिग्ध बनाया जा सके. राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर सभी जानते हैं कि किसी भी तरह का समझौता संभव नहीं है तो वे कौन से लोग थे जिनको केवल एनडीटीवी का प्रसारण ही आतंकियों की मदद करने वाला लगा और अब जब सरकार ने अपने एक दिन के रोक वाले आदेश को स्थगित कर दिया है तो क्या उन लोगों के विरुद्ध भी कोई कार्यवाही किये जाने का प्रस्ताव किया गया है जिनके संस्तुति पर बिना सोचे ही इस तरह के कदम उठाये गए ? देश में टीवी पर प्रसारित किये जाने वाले सभी कार्यक्रमों के लिए एक निश्चित आचार संहिता पहले से ही अस्तित्व में है फिर भी उसकी अनदेखी करके जिस तरह से सूचना प्रसारण मंत्रालय की समिति ने अपने स्तर पर यह रोक वाला फैसला लिया था क्या वह उस नियामक के अधिकारों का खुला उल्लंघन नहीं था ? इस तरह के मसलों को और भी संवेदनशीलता के साथ निपटने की आवश्यकता को अब सरकार में बैठे लोगों को समझना ही होगा.
निश्चित तौर पर एनडीटीवी सभी सरकारों के कामों की सबसे तीखी आलोचना या समीक्षा करने में सबसे आगे ही है और अन्य चैनेल्स के मुक़ाबले केवल शोर मचाने के स्थान पर उसमें जिस तरह से मुद्दे पर गहन जानकारी रखने वाले लोगों की राय से दर्शकों को अवगत कराने का प्रयास किया जाता है वह अपने आप में सभी से उसे अलग भी करता है. किसी भी विमर्श में जिस तरह से ऊंची आवाज़ों में कमज़ोर पक्षों को रखने वाले विशेषज्ञ चिल्लाते हुए दिखाई देते हैं उससे उनका पक्ष मज़बूत तो नहीं होता पर उनकी मुद्दों पर समझ की कमी ही सामने आती है. टीवी कोई युद्ध का मैदान तो नहीं है जहाँ चिल्लाकर अपनी बात को आगे रखने का प्रयास किया जाये क्योंकि सक्षम लोकतंत्र में विचारधारा को प्रस्तुत करने की आवश्यकता होती है जिससे सभी पक्षों की बातें जन सामान्य तक पहुंचाई जा सकें. इस मुद्दे के बहाने एक बार फिर से प्रसारण नियामक के अधिकारों के बारे में भी विचार किये जाने की आवश्यकता है क्योंकि उसके अधिकारों के साथ ही आम लोगों तक सही आवाज़ को पहुँचाया जा सकेगा.
जिस रिपोर्टिंग पर सरकार ने एनडीटीवी पर एक दिन का प्रतिबन्ध लगाया है कुछ वैसा ही दिखाने वाले अन्य टीवी चैनेल्स के विरुद्ध कार्यवाही न करने से एनडीटीवी का पक्ष कोर्ट में मज़बूत होता दिखा संभवतः इसलिए ही सरकार ने इस मुद्दे पर अपने स्तर से और समीक्षा करने के लिए इस आदेश को स्थगित कर दिया है. केवल इस मामले में ही नहीं बल्कि अन्य मामलों में भी सभी टीवी चैनेल्स को और भी अधिक ज़िम्मेदार होने का समय अब आ गया है क्योंकि जब तक प्रसारक अपने स्तर से ज़िम्मेदारी को नहीं समझेगा उस पर इस तरह की कार्यवाही का दबाव बनता ही रहने वाला है. सरकार को भी एक और मज़बूत स्वतंत्र नियामक आयोग के गठन के बारे में विचार करना चाहिए और उसके पास प्रतिबन्ध लगाने के पूरे अधिकार होने चाहिए जिनका अनुपालन सरकार के स्तर से किया जाना संभव किया जा सके. सरकार को दंड हिलाने के स्थान पर अनुपालक की भूमिका का निर्वहन करना चाहिए साथ ही इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि सोशल मीडिया में जिस तरह से विभिन्न मुद्दों पर अनावश्यक दबाव बनाने की कोशिशें की जाती हैं उन पर ध्यान न देते हुए नियमानुसार कार्यवाही करने की तरफ बढ़ना चाहिए. केवल एनडीटीवी ही नहीं बल्कि सभी चैनेल्स को इस बारे में और भी अधिक सावधानियों के साथ रिपोर्टिंग करनी चाहिए जिससे संवेदनशील जानकारी किसी भी तरह से देश के दुश्मनों तक न पहुँचने पाए.



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