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चीन-भारत सम्बन्ध

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मोदी सरकार की विदेश नीति में नए तत्वों को समाहित किये जाने के बाद जहाँ आम तौर पर यह धारणा मज़बूत हो रही है अब भारत ने आये अवसरों को खोजना शुरू कर दिया है तथा आने वाले समय में उसकी नीति में आवश्यकता के अनुरूप और बड़े परिवर्तन भी दिखाई देने वाले हैं. आज के समय में भारत के सामने अपने व्यापारिक और अंतरराष्ट्रीय संबंधों में सबसे कठिन काम चीन के साथ अपने रिश्तों को स्थायी रखते हुए नए आयामों की तरफ बढ़ाना भी है. चीन और भारत में मूलभूत अंतर यही है कि चीन में लंबे समय से वामपंथी सरकार चल रही है और इस वामपंथ कि यह खासियत रही है कि इसने अपने सर्वहारा के कल्याण के साथ ही आधुनिक मामलों में खुले बाज़ार का भी समर्थन किया है जिससे आज पूरे विश्व में चीन में बने सस्ते सामान की बहुतायत देखी जा रही है. इस रूप में चीन ने अपने को एक बहुत बड़े निर्माता राष्ट्र के रूप में खड़ा करने में सफलता पायी है जबकि घरेलू राजनीति के चलते भारत में आवश्यक आर्थिक सुधारों पर भी जमकर विरोध किया गया जिससे डब्ल्यूटीओ में भारत के बाद प्रवेश करने वाला चीन तो उसका भरपूर लाभ उठाने में सफल रहा जबकि हम आज भी अपनी नीतियों को उस स्तर का बनाने में लगे हुए हैं जहाँ चीन दो दशक पूर्व हुआ करता था.
अपने सस्ते श्रम के चलते अब भारत भी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए एक बेहतर स्थान साबित हो रहा है पर आज के समय में सबसे बड़ी समस्या यह भी है कि अब भारत को चीन की पहले से मौजूदगी को भी टक्कर देने के साथ व्यापार में अपने को साबित भी करना पड़ रहा है ऐसी स्थिति में चीन की तरफ से भारत को हर स्तर पर परेशान करने की नीति का आरम्भ किया जा चुका है जिसे पाकिस्तान के सम्बन्ध में आसानी से समझा जा सकता है. साठ के दशक में जब भारत का चीन से कोई खुला संघर्ष नहीं था तब भी उसने लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश को हड़पने की कोशिशें की थीं जबकि यह दोनों क्षेत्र उस समय निर्जन जानकर भारत की तरफ से वहां तक सुरक्षा के आज जैसे प्रबंध नहीं किये गए थे. चीन के तिब्बत पर कब्ज़ा करने के बाद ही उसकी भारत के प्रति नीति में बड़ा बदलाव आया और पंचशील की शांति वार्ताओं के बीच उसने भारत पर हमला भी किया तिब्बत को कमज़ोर करके भारत की सीमायें सीधे चीन के साथ मिल गयीं जिसका सबसे बड़ा दुष्प्रभाव यही हुआ कि भारत ने उसकी बड़ी कीमत भी चुकाई.
आज जब भारत चीन की आर्थिक प्रगति के रास्ते में आ रहा है तो चीन उस पर कैसी कठोर प्रतिक्रिया अप्रत्यक्ष रूप से देना शुरू कर चुका है. अपने एक प्रान्त में इस्लाम के अनुयायियों पर कड़े प्रतिबन्ध लगाने के बाद भी वह पाकिस्तान की भारत में गड़बड़ी करने की हर हरकत को नज़र अंदाज़ भी करता जाता है. आज जब चीन को भारत से एक बड़ा बाज़ार मिल रहा है फिर भी वह उस तरफ से इतना लापरवाह है तो इसका मतलब यही निकाला जा सकता है कि वह जानता है कि भारत की तरफ से कोई आक्रामक कदम नहीं उठाया जायेगा. चीन आज भी लद्दाख और अरुणाचल मामले पर गाहे बगाहे प्रतिक्रिया देता रहता है जिससे यह मामला भी ज़िंदा रह सके. उसकी हरकतों का इस बात से भी अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि अपने राष्ट्रपति की २०१४ की महत्वपूर्ण भारत यात्रा के दौरान भी वह लद्दाख में घुसपैठ को ज़िंदा रखकर इसे विवादित बताने की अपने कोशिशें भी जारी रखता है. भारत के सामने आज यही बड़ा संकट है कि वह चीन से कोई खुला युद्ध नहीं कर सकता है तथा अधिकांश विवादित क्षेत्रों में चीन की तरफ से पहुंचना आसान है जबकि भौगोलिक परिस्थितियों के चलते भारत के लिए यह आज भी दुरूह और खर्चीला भी है. भारत के पास चीन पर दबाव बनाने के अवसर भी हैं पर उनका उपयोग करने से नयी तरह की समस्या सामने आ सकती है इसलिए पार्टी के रूप में भाजपा से जुड़े हुए लोग तो चीन के सामान का बहिष्कार करने की बातें करते दिखाई देते हैं जबकि सरकार चीन के साथ और भी मज़बूत संबंधों की पैरोकार ही लगती है.



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