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सर्जिकल स्ट्राइक पर राजनीति

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देश में किसी भी मामले पर राजनीति करने और हर मामले पर राजनीति करने के नुस्खे खोजने की जो नयी परंपरा चल पड़ी है उससे भले ही कुछ समय के लिए राजनैतिक दलों को कुछ लाभ अवश्य मिल जाये पर आने वाले समय में इस तरह की घटिया राजनीति भारत के वैश्विक समूह में किसी भी देश के साथ संबध बनाने या बिगाड़ने का काम भी कर सकती है. सर्जिकल स्ट्राइक के बाद जिस तरह से देश के अंदर और बाहर दो तरह की बातें सामने आ रही हैं उन्हें देखते हुए इस बात से इनकार भी नहीं किया जा सकता है कि इस मुद्दे का भाजपा द्वारा लाभ नहीं लिया जायेगा और विभिन्न शहरों में लगे हुए पोस्टर अब इस बात की तरफ संकेत करने भी लगे हैं. कुछ राज्यों में आगामी विधान सभा चुनावों में भाजपा भले ही आधिकारिक तौर पर इन सर्जिकल स्ट्राइक्स का लाभ न ले पर उसके समर्थकों की तरफ से सोशल मीडिया में इसकी शुरुवात हो चुकी है जो आने वाले चुनावों तक और भी बढ़ने ही वाली है. इस मुद्दे पर राजनीति और देश हित में बहुत ही बारीक रेखा रह गयी है जिसे पार करने या न करने के बारे में सभी दलों के अपने अपने दावे भी हैं. क्या हमारे देश में मुद्दों का इतना अभाव हो गया है कि अब सेना की कार्यवाही का उपयोग/ दुरूपयोग केवल राजनैतिक लाभ उठाने और एक दूसरे को नीचा दिखाने के लिए भी किया जाने लगेगा ?
इस मामले में जिस तरह से देश के अंदर भी दो खेमे बनते नज़र आ रहे हैं उनको देखते हुए किसी भी परिस्थिति में इसे स्वस्थ शुरुवात नहीं कही जा सकती है क्योंकि सत्ता देश के राजनैतिक दल ही चलाने वाले हैं भले ही उनके सामने किसी भी तरह की परिस्थितियां क्यों न हों. इस मामले में राजनैतिक रूप से परिपक्वता दिखाने का समय अब भाजपा के सामने है क्योंकि विपक्ष में रहते हुए उसकी तरफ से जिस तरह की बयानबाज़ी लगातार की जाती थी आज उसी को लेकर जब उससे सवाल पूछे जा रहे हैं तो वह अपने को बहुत ही असहज पा रही है. निश्चित तौर पर इस मामले में पार्टी के अलावा पीएम के स्तर से भी प्रयास किये जाने की आवश्यकता भी है क्योंकि जहाँ सरकार इस मुद्दे की संवेदनशीलता को समझते हुए चुप्पी साधे हुए है वहीं भाजपा इस मुद्दे पर राजनीति न करने की अपील करते हुए भी खुले तौर पर अपने नेताओं को राजनीति करते रहने की छूट देती जा रही है जिसकी आज के समय में कोई आवश्यकता भी नहीं है. सर्जिकल स्ट्राइक से मोदी सरकार अपनी कमज़ोर होती छवि को चमकाने के लिए जनता तक जो सन्देश पहुँचाना चाहती थी वह पहुँच भी चुका है इसलिए अब इस मामले में राजनीति से बचा जाना चाहिए.
राजनैतिक दलों के अपने अपने दावे और बयान सामने आ रहे हैं जिनमें परिपक्वता के स्थान पर केवल आरोप ही अधिक दिखाई दे रहे हैं तो ऐसी परिस्थिति में क्या कोई दल देश और सेना के बारे में भी सोचना चाह रहा है ? इस तरह के अभियानों में शुरू से अंत तक जिस गोपनीयता को रखा जाना चाहिए स्पष्टः मोदी सरकार उसमें पूरी तरह से विफल हो गयी है पर अब भी समय है कि किसी भी तरह के राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय दबाव के चलते अब सरकार को इस बारे में कोई सबूत दिए जाने से पूरी तरह परहेज़ भी करना चाहिए क्योंकि भारतीय सेना और सरकार की कार्यवाही पर सभी को पूरा भरोसा भी है. यह तो बहुत रणनीतिक कदम था सरकार तो आम मुठभेड के बारे में भी पूरी जानकारी नहीं दिया करती है इसलिए इस बारे में और भी गंभीर होने की आवश्यकता है. सभी दलों को अपने नेताओं को स्पष्ट रूप से यह समझाना चाहिए कि इस मुद्दे पर किसी भी तरह की राजनीति नहीं की जाएगी जिससे निचले स्तर और सोशल मीडिया पर अनावश्यक आरोप प्रत्यारोपों का घटिया दौर भी बंद हो सके. सरकार के सामने इसे सार्वजनिक करने की कोई आवश्यकता भी नहीं है इसलिए इन बातों से पूरी तरह किनारा करते हुए सभी राजनैतिक दलों को आगे बढ़ने के बारे में सोचते हुए आतंक के खिलाफ सर्वसम्मत कठोर कार्यवाही का सर्वसम्मत संकल्प लेना चाहिए.



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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Jitendra Mathur के द्वारा
October 10, 2016

राष्ट्रहित में की गई सैन्य कार्रवाई पर किसी भी राजनीतिक दल द्वारा किसी भी प्रकार की स्वार्थारित राजनीति अनुचित ही है आदरणीय आशुतोष जी । मैं आपके विचारों से पूर्णरूपेण सहमत हूँ ।


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