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सीमापार से आतंक

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कश्मीर घाटी में जिस तरह से दो महीनों से अराजकता की स्थिति बनी हुई है उसी बीच पाकिस्तान की तरफ से एक बार फिर से सर्दियाँ बढ़ने और बर्फ पड़ने से पहले आतंकियों की नयी खेप भारत में भेजने की कोशिशें तेज़ कर दी गयी हैं. एक ही दिन में सीमा पर जिस तरह से कई स्थानों पर आतंकी कार्यवाही देखने को मिली उससे यही लगता है कि इस मोर्चे पर अब पाक के साथ और अधिक सख्ती करने का समय आ गया है और यह काम केवल स्थानीय सीमा पर ही नहीं किया जाना चाहिए बल्कि आवश्यकता पड़ने पर इसे कूटनैतिक, राजनैतिक और आर्थिक हर तरह के मोर्चे आज़माया जाना चाहिए जिससे पाकिस्तान पर वास्तव में कुछ ठोस दबाव डाला जा सके. विपक्ष में रहने पर पाक के खिलाफ मुखर रहने वाली भाजपा ही सत्ता में आने पर पाक से हर तरह के सम्बन्ध मज़बूत करने की बात करने लगती है क्योंकि विपक्ष के रूप में कभी भी कांग्रेस की तरफ से बातचीत का उस स्तर पर राजनैतिक कारणों से विरोध नहीं किया जाता है जैसा करने में भाजपा को महारत हासिल है. संसद ने भी जिस तरह से कश्मीर की अशांति पर एकमत से मोदी सरकार का समर्थन किया उससे उसे आगे बढ़ने की शक्ति भी मिली और दुनिया में सन्देश भी चला गया है कि भारत के राजनैतिक दलों में चाहे कितने भी मतभेद क्यों न हों पर राष्ट्रीय मसलों पर वे सदैव एक साथ ही खड़े दिखाई देते हैं.
२६/११ के बाद से जिस तरह से मनमोहन सरकार ने पाक से किसी भी तरह की द्विपक्षीय संबंधों पर एक तरह से रोक ही लगा दी थी वह २०१४ तक उसी तरह चलती रही और यहाँ तक दोनों देशों के बीच खेलों तक पर भी इस राजनैतिक कटुता का असर भी पड़ा था और एक नीति के तहत बिना कुछ बोले ही मनमोहन सरकार ने पाक को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अलग थलग कर दिया था पर मोदी सरकार ने अपनी पारी शुरू करते समय एक बार फिर से सभी दक्षिण एशियाई देशों को बुलाने के साथ पाक को न्योता दिया जिसका उसने अभी तक नाजायज़ फायदा ही उठाया है. सरकार बनने के लगभग दो साल बाद अब पीएम मोदी को यह लगा रहा है कि पाक को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अलग थलग करना आवश्यक हो गया है तो क्या सरकार की तरफ से पाकिस्तान के आंकलन में कमी नहीं रह गयी या कूटनैतिक मोर्चों पर मोदी सरकार ने पाक के सम्बन्ध में जो कुछ सोचा था वह वैसा नहीं हो पाया ? पाक आज़ादी के समय से ही विश्वसनीय नहीं रहा है तो उस स्थिति में अटल सरकार के साथ कारगिल के समय किये गए बर्ताव के बारे में आंकलन करने में मोदी सरकार से चूक तो हो ही गयी है जिसे सुधारने के लिए अब वे पाक को अलग थलग करने की बात करने लगे हैं.
इस मामले में अब भारत द्वारा पाक को दिया गया मोस्ट फेवरेट नेशन का दर्ज़ा अविलंब वापस लेना चाहिए क्योंकि आज पाक की नीतियों से परेशान बांग्लादेश और अफगानिस्तान तक उसके खिलाफ अपने विरोध को खुलेआम प्रदर्शित कर रहे हैं जबकि चुनावी भाषणों में पाक को चुटकियों में मसलने की बाते करने वाले पीएम मोदी और उनके मंत्रिमंडल के सहयोगी अब पाक को लेकर निर्णय ही नहीं कर पा रहे हैं. पाक के आतंक निर्यात करने के कारण जनता और राजनैतिक दलों में उसके खिलाफ सख्त क़दमों की राय सदैव ही रही है पर अब जब पाक किसी भी तरह से मान नहीं रहा है तो समय आ गया है कि उसको पूरी तरह से अलग थलग करने के प्रयास भी शुरू किये जाएँ तथा वह मध्य एशिया तक माल की आवाजाही पर जितनी रोक लगता है उतनी ही अब भारत को भी पाक पर लगानी चाहिए. सीमा पर व्यापार को एक चेतावनी के रूप में एक दायरे में सीमित कर देना चाहिए तथा पाक की तरफ से बदलाव न दिखाई देने की स्थिति में सीमा पर व्यापार को पूरी तरह से प्रतिबंधित भी कर देना चाहिए. केवल एक तरफ व्यापार से पाक को ही अधिक लाभ मिल रहा है तो उस परिस्थिति में भारत को कड़े कदम उठाने और पाक पर दबाव बनाने से भी नहीं चूकना चाहिए तभी पाक पर सही मायनों में दबाव बनाया जा सकेगा.



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