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स्वायत्त रिज़र्व बैंक

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अपने तीन साल के कार्यकाल को पूरा करने के अंतिम चरण में रिज़र्व बैंक के गवर्नर रघुरामन राजन ने जिस तरह से केंद्रीय बैंक की स्वायत्तता के बारे में स्पष्ट रूप से एक बार फिर राय दी है वह निश्चित तौर पर सरकार को कुछ हद तक विचलित कर सकती है क्योंकि देश के अंदर की राजनैतिक परिस्थितियों के चलते कोई नेता मंत्री या स्वयं सरकार की तरफ से कैसा भी बयान सामने आता रहे पर जब केंद्रीय बैंक के गवर्नर के रूप में फैसले लेने का समय होता है तो अधिकांश मामलों में सरकारें अपने राजनैतिक और व्यापारिक घरानों से संबंधों के चलते दबाव बनाने से भी नहीं चूकती हैं. निश्चित तौर पर पूरी दुनिया में चल रही अघोषित आर्थिक सुस्ती के समय २०१३ में मनमोहन सरकार ने जिस उद्देश्य के साथ राजन की नियुक्ति की थी वे उसमें पूरी तरह से सफल भी रहे हैं. आज जब वे वापस अपने शिक्षण के काम में लौट रहे हैं तो भारत में रूपये की स्थिति स्थिर कही जा सकती है और साथ ही विदेशी मुद्रा भंडार में भी अप्रत्याशित रूप से बढ़ोत्तरी भी उनके कार्यकाल में ही हुई है फिर भी मोदी सरकार से काम करने की शर्तें तय न हो पाने के चलते राजन ने खुद ही दूसरे कार्यकाल के लिए काफी पहले ही अनिच्छा जता कर मोदी सरकार के लिए नए गवर्नर को चुनने का काम आसान भी कर दिया था.
बेशक राजन ने अपने कार्यकाल में बहुत उतार चढाव देखे और उनको देश की अर्थव्यवस्था को गति में बनाये रखने के लिए कई बार सरकार से टकराव भी मोल लेना पड़ा तथा कुछ ऐसे मुद्दों पर भी अपने विचार सार्वजनिक रूप से व्यक्त करने पड़े जिनका रिज़र्व बैंक के गवर्नर के रूप में कोई सम्बन्ध भी नहीं था क्योंकि मुखर पीएम मोदी और हर बात पर सोशल मीडिया में बात करने वाली सरकार भी कई उन मुद्दों पर चुप्पी लगाए बैठी थी जिनसे देश में संभावित निवेश पर असर पड़ रहा था. यदि विवादित मुद्दों पर सरकार की तरफ से पहले ही वक्तव्य आ जाते तो राजन को उनपर बोलकर विदेशी निवेशकों को यह सन्देश नहीं देना पड़ता कि सरकार के अलावा देश की आर्थिक प्रगति पर नज़र रखने के लिए रिज़र्व बैंक पूरी तरह से काम कर रहा है और आने वाले समय में निवेशकों के हितों का पूरा ध्यान भी रखा जायेगा. बाद में जब पीएम मोदी ने इन मुद्दों पर अपनी पार्टी के लोगों को नसीहते देनी शुरू कर दीं उसके बाद से राजन ने कभी भी इन मुद्दों पर कोई वक्तव्य नहीं दिए. आने वाले समय में ऊर्जित पटेल पर इन सभी बातों के लिए बहुत दबाव रहने वाला है पर वे मुखर होने के स्थान पर केवल अपने काम पर ध्यान देने वाले व्यक्ति हैं और राजन के साथ काम करने के अनुवभव के चलते ही मोदी सरकार ने राजन की नीतियों को आगे बढ़ाने के लिए ही ऐसा कदम उठाया है.
देश के मज़बूत आर्थिक माहौल के लिए रिज़र्व बैंक का स्वायत्त होना बहुत आवश्यक है क्योंकि आम तौर पर राजनैतिक दलों के पास इतनी समझ और इच्छा शक्ति नहीं होती कि वे अपने स्तर से हर आर्थिक मुद्दे की गंभीरता को समझ सकें. ऐसी परिस्थिति में यदि अर्थ क्षेत्र से जुड़ा हुआ कोई विशेषज्ञ गवर्नर के पद पर होता है तो देश को चिंता करने की आवश्यकता नहीं होती है. एक स्वतंत्र निर्णय लेने वाला गवर्नर सदैव ही मज़बूत आर्थिक परिदृश्य को खड़ा करने में सफल हो सकता है पर जब समितियों के माध्यम से उसके पर करतने की कोशिशें की जाने लगती हैं तो वह देश के लिए ही दुर्भाग्यपूर्ण होता है क्योंकि निर्णय लेना सामूहिक ज़िम्मेदारी बन जाता है. हमारे देश में किसी भी आशानुरूप सफलता के न मिलने पर जिस तरह से दोष देने के लिए सबसे कमज़ोर व्यक्ति को खोजने का काम शुरू कर दिया जाता है यदि गवर्नर की शक्तियों पर वैसा ही प्रतिबन्ध लगाया गया तो देश के ये लंबे समय में वह बहुत ही घातक हो सकता है. मोदी सरकार ने गवर्नर के पर कतरने की शुरुवात भी कर दी है और हो सकता है कि इन सीमित अधिकारों के साथ राजन ने खुद को सही न पाया हो जिसके चलते ही वे दूसरे कार्यकाल के लिए खुद ही दूर हो गए थे. आशा की जानी चाहिए कि सरकार ऊर्जित पटेल को भी स्वतंत्रता के साथ काम करने देगी जिससे वे देश की मौद्रिक नीति को राजनैतिक चश्में के स्थान पर आर्थिक नज़रिये से देखने की अपनी शक्ति को और भी पैना कर सकें और देशहित आवश्यक कदम उठाने के लिए खुलकर काम कर सकें.



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