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भारत-अमेरिका रक्षा समझौता

Posted On: 31 Aug, 2016 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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दूसरे विश्वयुद्ध में जापान के विरुद्ध दो बार परमाणु बम का दुरूपयोग करने के बाद जिस तरह से अमेरिका अपने को विश्व में सर्वश्रेष्ठ साबित करने के लिए कुछ भी करता रहता है उसकी परिणीति पूरी दुनिया ने एक लंबे शीत युद्ध के रूप में देखी है. उस समय भारत समेत बहुत सारे अन्य देश जो या तो आज़ाद हो रहे थे या उसके बाद आज़ाद हुए हैं उनकी तरफ से भारत के नेतृत्व में गट निरपेक्ष आंदोलन की शुरुवात की गई थी जो कई दशकों तक अपने उद्देश्य को प्रभावी ढंग से निभाने में सफल भी रहा और बहुत बार उसके कारण ही कई देशों पर अमेरिका नाटो या उसके प्रतिद्वंदी रूस और वारसा संधि वाले देशों का दुष्प्रभाव नहीं पड़ सका. आज़ादी के बाद से ही निर्गुट होते हुए भी भारत ने रूस के साथ बहुत मज़बूत आर्थिक, राजनैतिक और रक्षा सम्बन्ध स्थापित किये जो आज भी काफी हद तक दोनों देशों की आवश्यकताएं पूरी करने में लगे हुए हैं. आज एक ध्रुवीय विश्व में जिस तरह से अमेरिका हर तरफ अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिशों में लगा हुआ है भारत के साथ उसका ताज़ा रक्षा समझौता उसी कड़ी का एक हिस्सा है.
वैसे तो अमेरिका ने इस पूरी दुनिया में लगभग १०० देशों से इस तरह के समझौते कर रखे हैं पर भारत को इस तरह के निर्णय के लिए झुकाना उसकी अब तक की सबसे बड़ी उपलब्धि कही जा सकती है क्योंकि चीन के विरुद्ध अब वह भारत के रक्षा प्रतिष्ठानों का बखूबी दुरूपयोग कर सकेगा जबकि भारत को उससे किसी भी तरह का लंबी अवधि का लाभ नहीं मिलने वाला है. अमेरिका विश्व में एक मात्र ऐसा राष्ट्र है जिसको केवल अपने राष्ट्रीय हित ही दिखाई देते हैं और वह समय आने पर किसी भी सहयोगी देश को भी अकेले छोड़ने में चूकता नहीं है. ऐसी परिस्थिति में यह समझौता हमारे देश के लिए किस तरह की चुनौतियाँ लेकर आएगा यह तो समय ही बता सकता है पर इतना निश्चित है कि भारत के हितों की रक्षा करने के लिए अमेरिका कभी भी चीन या पाकिस्तान के विरुद्ध इस समझौते के चलते भारत के साथ नहीं खड़ा होने वाला है. एक समय मनमोहन सरकार ने भी इस समझौते की कोशिश की थी और ड्राफ्ट भी बनाया गया था पर नौसेना और वायु सेना की तरफ से कड़ी आपत्तियां आने के बाद उनकी सरकार ने इस मामले को ठन्डे बस्ते में डाल दिया था.
कश्मीर घाटी में जिस तरह से पाक ने खुले तौर पर जिहाद के नाम पर प्रॉक्सी वॉर छेड़ा हुआ है अमेरिका आज तक उस पर कठोर बयानबाज़ी भी करने से बचता रहता है क्योंकि उसे पाकिस्तानी सेना का हर स्तर पर समर्थन मिलता ही रहता है भले ही वहां के नेता कुछ भी कहते रहें. अमेरिका सिर्फ इसलिए ही पाकिस्तान में तानशाहों को झेलता है क्योंकि उसे राजनेताओं से डील करने में समस्या होती है. क्या इस समझौते के अन्तर्गत अब अमेरिका भारत के साथ मिलकर पीओके से लगाकर लाहौर और स्वात घाटी तक भारतीय हितों की रक्षा करने के लिए हवाई हमले करने की स्थिति में भारत के साथ देगा ? यदि भारत के लिए सामरिक महत्व के इन मुद्दों पर अमेरिका चुप्पी लगता है तो यह समझौता हमारे किस काम का है ? भारत के महत्वपूर्ण सहयोगी सद्दाम हुसैन पर अमेरिका ने जो आरोप लगाए थे वे आज झूठे साबित हो चुके हैं पर भारत के विश्वसनीय सहयोगी आज उसके साथ नहीं है तालिबान ने जिस तरह से अफगानिस्तान में भारत समर्थक पूर्व राष्ट्रपति नजीबुल्लाह को फांसी पर चढ़ाया था तब अमेरिका ने क्या किया था ? इस समझौते के बाद अब अमेरिका को भारत के रूप में एक सुविधा संपन्न सैन्य सहयोगी तो मिल गया है क्योंकि उसकी दुनिया के हर देश से किसी न किसी मुद्दे पर तकरार होती रहती है तो वह हमारे सैन्य प्रतिष्ठानों का दुरूपयोग करता रहेगा और भारत ने आज तक संयुक्त राष्ट्र शांति मिशन के अतिरिक्त केवल १९७१ में बांग्लादेश और १९८७ में श्रीलंका में अपनी फौजों को भेजा था. ऐसे में यह समझौता हमें अमेरिका के हितों को सँभालने में एक मजबूरी के रूप में ढोना पड़ सकता है अगर पाक को लेकर अमेरिका अपनी आज की स्थिति को नहीं बदलता है तो भारत के लिए इस समझौते में पाने लायक कुछ भी नहीं दिखाई देता है.



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