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भारत भाग्य विधाता

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कुछ भी कहकर जल्दी ही अपने को मीडिया और लोगों की नज़रों में चढाने की एक नयी मानसिकता के साथ आजकल देश में नया चलन चल पड़ा है. इलाहाबाद के एक स्कूल प्रबंधन द्वारा जिस तरह से राष्ट्रगान में आयी पंक्ति “भारत भाग्य विधाता” को इस्लाम की मान्यताओं के विरुद्ध बताकर अपने स्कूल में उसके गाने पर प्रतिबंध लगा रखा गया था वह अपने आप में अजीब तरह की घटना ही है क्योंकि पूरे देश में कुछ लोग इस तरह की बातें करके अनावश्यक रूप से बेमतलब की चर्चाओं को सुर्ख़ियों में रखने का काम किया करते हैं. आज़ादी के बाद बनायीं गयी संविधान सभा ने “जन गण मन” को राष्ट्रगान के रूप में स्वीकार किया था और आज तक किसी मुस्लिम की तरफ से इस तरह से इसके विरोध की बात नहीं की गयी है पर अचानक से इलाहाबाद में किसी एक व्यक्ति को लगता है कि राष्ट्रगान इस्लाम विरोधी है ? असल में समस्या का मूल कारण कुछ और ही है जहाँ पर आज कोई भी खुद को इस्लाम का रक्षक बताकर इस तरह की बातें करके चर्चा में आ जाना चाहता है और दुर्भाग्य से हमारा कानून इस तरह के किसी भी मामले को ठीक ढंग से संभाल नहीं सकता है या फिर जिनके हाथों में कानून की रक्षा का भार है वे खुद ही इस तरह की परिस्थिति में संज्ञा शून्य हो जाते हैं.
देश ने आम नागरिकों को मौलिक अधिकारों के अंतर्गत व्यक्तिगत रूप से पूरी धार्मिक स्वतंत्रता दे रखी है पर साथ ही उन कर्तव्यों के बारे में भी स्पष्ट कर रखा है जिनकी देश नागरिकों से अपेक्षा करता है. आज देश के किसी भी धर्म को मानने वाले नागरिक को समान अधिकार मिले हुए हैं फिर क्यों कुछ नागरिक इस तरह की अनावश्यक बातों को लेकर पूरे समाज को इतनी आसानी से कटघरे में खड़ा कर सकते हैं ? क्या इन लोगों को अपने कर्तव्यों को भूलकर अधिकारों के अतिक्रमण करने के कारण इनके अधिकारों से वंचित नहीं कर देना चाहिए और क्या इनका अपने समाज को नीचा दिखाने के प्रयास में समाज से बहिष्कार नहीं होना चाहिए ? पर यह सब समाज के अंदर से ही हो सकता है तथा कानून आवश्यकता पड़ने पर अपने अनुसार कार्य कर सकता है जिसका समाज पर कोई असर नहीं पड़ता है. कोई भी व्यक्ति देश में अपनी धार्मिक मान्यताओं को केवल तब तक मान सकता है जब तक वह दूसरे की मान्यताओं में दखल नहीं देता है किसी भी तरह से अपनी मान्यताओं को कोई भी व्यक्ति या समाज सार्वजानिक रूप से दूसरे पर नहीं थोप सकता है यह भी इस देश के संविधान में लिखा है.
आज देश में संविधान में मिले अधिकारों पर जिस तरह से कुतर्क किये जाने लगे हैं उनसे लगता है कि हम भारतीय समाज के रूप में इतने अधिकारों को पचा नहीं सकते हैं तो संसद को एक बार फिर से नागरिकों को दिए गए अधिकारों पर विचार करना चाहिए और मुंह फाड़कर अधिकारों की दुहाई देने वालों के मुंह पर कर्तव्यों की उचित सिलाई भी करनी चाहिए. सभी को यह बात याद रखनी चाहिए कि अधिकार खैरात में मिली हुई वस्तु नहीं बल्कि कर्तव्यों के समुचित निर्वहन के पुरुस्कार स्वरुप मिली हुई नेमत ही है और यदि हम अपने कर्तव्यों में अनुत्तीर्ण होते हैं तो हमारे अधिकारों में आने वाले समय में कटौती की संभावनाएं भी स्वतः ही बढ़ जाती हैं. जिस एक स्कूल और उसके प्रबंधकों को कुछ पंक्तियों से उनकी धार्मिक मान्यताओं का अतिक्रमण होता दिखाई देता हैं क्या उन्हें अपने समाज पर लगने वाले उस सवाल की खरोंचे महसूस नहीं होती हैं जिनके भरने में काफी समय लगने वाला है ? क्या वे मौलाना आज़ाद, शहीद वीर अब्दुल हमीद और अब्दुल कलाम जैसे लोगों से अधिक धार्मिक हैं जिनके दिलों में धर्म से पहले हिंदुस्तान बसता था ? वंदे मातरम और भारत माता की जय बोलते हुए जब अब्दुल हमीद ने इस्लामी देश पाकिस्तान के पैटर्न टैंकों को ध्वस्त करना शुरू किया था तब क्या उनकी धार्मिक मान्यताएं नहीं थीं ? अवश्य थीं पर वे उस समय इस देश से मिले हुए अधिकार के इस्तेमाल के साथ अपने कर्तव्यों में पूरी तरह से डूबे हुए थे पर उनको कुछ भी करके मशहूर होने के स्थान पर अपने कर्तव्यों को पूरा करने से मिलने वाली शोहरत ज़्यादा प्यारी थी.



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