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सार्क की प्रासंगिकता

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दक्षिण एशिया के सात देशों को अपनी साझा समस्याओं और सुविधाओं को साझा करने के साथ एक आर्थिक रूप से मजबूत क्षेत्र बनाने के सत्तर के दशक के शुरुवाती वर्षों में शुरू हुए प्रयासों ने ८ दिसंबर १९८५ को मूर्त रूप लिया जिसके बाद सार्क का गठन किया गया. इस समूह के चार्टर में शुरू से ही इस बात का उल्लेख किया गया था कि क्षेत्र के विकास के लिए सदस्य देश अपनी द्विपक्षीय समस्याओं को इन स्थान पर नहीं उठायेंगें क्योंकि इसके दो बड़े सदस्यों भारत-पाक के बीच बंटवारे के समय से ही गंभीर विवाद के रूप में कश्मीर और अंतरराष्ट्रीय सीमा मौजूद थी. आज इसके गठन के ३१ वर्ष होने पर भी पाकिस्तान ने यह बात नहीं समझी है कि इस मंच का सदुपयोग किस तरह से किया जाये क्योंकि उनको आज भी यही लगता है कि यदि भारत को पूरी छूट दे दी गयी तो वह पाकिस्तान के बाज़ार पर कब्ज़ा कर लेगा और उनके आर्थिक हित प्रभावित होने लगेंगें तभी आज भी उसकी तरफ से भारत को मोस्ट फेवरेट नेशन का दर्ज़ा नहीं दिया गया है और वह संगठन की मूल भावना के खिलाफ जाकर इस मंच से भी कश्मीर का मामला उठाने की कोशिशें लगातार ही करता रहता है जिसका इस संगठन के काम काज पर भी बहुत बुरा असर पड़ता है और संगठन के गठन पर ही प्रश्नचिन्ह लग जाता है.
हाल ही में इस्लामाबाद में सार्क देशों के गृह मंत्रियों की बैठक में पाकिस्तान ने जिस तरह का व्यवहार किया उसके बाद सार्क के होने या न होने के क्या मायने रह जाते हैं क्योंकि पूरी दुनिया जानती है कि आज पाक जेहादियों को अपरोक्ष रूप से हर तरह की मदद करता है और खास तौर पर भारत और अफगानिस्तान के लिए लगातार समस्याएं खडी करने का काम भी करता ही रहता है. इस तरह एक अंतरराष्ट्रीय मंचों से राजनयिक शिष्टाचार की अपेक्षा हर देश से की जाती है भले ही उनके आपस में कितने भी मतभेद क्यों न हों फिर भी जिस तरह से इस्लामाबाद में पाकिस्तान की तरफ से कश्मीर का राग अलापकर बैठक को ख़राब करने की कोशिश की गयी उसके कोई सकारात्मक परिणाम भी सामने नहीं आने वाले हैं. जब बांग्लादेश भी पाकिस्तान के आतंक समर्थक रवैये के चलते अपने मंत्री को इस बैठक में भेजने से इंकार कर सकता है तो ऐसा करने में भारत को क्या दिक्कत है ? जिस तरह से पाकिस्तान का माहौल ख़राब होने के चलते आज वहां पर कोई भी देश क्रिकेट खेलने को राज़ी नहीं होता है ठीक इसी तरह से अब पाकिस्तान से हर तरह के अंतरराष्ट्रीय आयोजनों को दूर करवाने की कोशिश अब भारत को भी करनी चाहिए.
सार्क के सम्बन्ध में भारत को अन्य देशों के साथ मिलकर अब पाकिस्तान को अलग थलग करने का समय आ गया है क्योंकि इसके चार्टर के अनुसार केवल एक देश ही सारी बातों के लिए ज़िम्मेदार कैसे ठहराया जा सकता है ? पाकिस्तान की तरफ से सार्क के हर कदम को रोकने की हर संभव कोशिशें की जाती हैं क्योंकि उसे लगता है कि देशों में इस स्तर का सहयोग बढ़ने पर भारत को ही इसका सबसे अधिक लाभ मिलेगा और वह कश्मीर जैसे विवादित मुद्दे पर बात कर पूरे माहौल को ख़राब करने की कोशिश करने में ही लगा रहता है. भारत को एक बात और भी स्पष्ट करने की आवश्यकता भी है कि पाकिस्तान के इस तरह एक रवैये के चलते अब उसके साथ सार्क स्तर पर सम्बन्ध रख पाना भी संभव नहीं है जिससे सदस्य देशों की तरफ से पाक पर कुछ दबाव भी बनाया जा सके. आज जब पूरा विश्व एक आर्थिक बाजार के रूप में सामने आ चुका है तो उस परिस्थिति में आखिर सदस्य देश इस तरह कब तक अपने आर्थिक हितों के लिए सार्क की तरफ ताकते रहेंगें ? इस पूरे मसले में भारत का ही सबसे अधिक नुकसान होता है इसलिए अब पहल उसकी तरफ से ही होनी चाहिए और सदस्य देशों की तरफ से सार्क और द्विपक्षीय व्यापारिक, आर्थिक, सामाजिक संबंधों के लिए एक समयबद्ध संरचना पर विचार करना चाहिए वार्ना सार्क अपने उद्देश्य को कभी भी हासिल नहीं कर पायेगा.



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