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यूपी के असुरक्षित राजमार्ग

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बुलंदशहर की शर्मनाक घटना के बाद एक बार फिर से इस तरह की घटनाओं पर हमारा शुतुरमुर्गी रवैया सामने आने लगा है और अगले वर्ष यूपी में विधान सभा चुनाव होने के चलते भी लगभग हर राजनैतिक दल इस मामले को गर्माने में लगा है. घटना का खुलासा होने पर यूपी सरकार की तरफ से जितनी तेज़ी काम किया जा रहा है वह सही दिशा में है पर इसके साथ ही जिस तरह से सरकार को घेरने का काम भी शुरू हुआ है वह पुलिस प्रशासन के लिए सर दर्द भी साबित हो सकता है क्योंकि वर्तमान में पूरे उत्तर भारत में मुख्य मार्गों पर कांवड़ यात्रा भी ज़ोरों से चल रही है. संगठित लूट-पाट एक सुनियोजित काम होता है और निश्चित तौर पर उससे निपटने के लिए पुलिस के पास संसाधनों की बेहद कमी है फिर भी इस तरह की घटनाओं के होने वाले स्थानों को चिन्हित करके सरकार इन लुटेरों के खिलाफ कड़े कदम तो उठा ही सकती है. अपनी तरह का यह पहला मामला भी नहीं बताया जा रहा है जिससे पता चलता है कि स्थानीय पुलिस के पास इस तरह से लूट करने और महिलाओं के मिल जाने पर उनके साथ बलात्कार करने की घटनाओं की जानकारी भी थी पर आज तक इस गिरोह के खिलाफ सख्त कार्यवाही क्यों नहीं की गयी इसका जवाब देने के लिए आज बुलंदशहर से मेरठ तक पुलिस के पास नहीं है.
लूटने वाले संगठित गिरोहों की हरकतों से शहरों में भी लोग परेशान ही रहा करते हैं और यह स्थिति लगभग हर राज्य में कहीं न कहीं पायी जाती है पर किसी भी सरकार या नेता के पास इतना समय ही नहीं है कि क्षेत्र विशेष में राज्यों की सीमाओं के आरपार इस तरह के अपराध करने वालों के खिलाफ कोई ठोस कार्यवाही कर उनको समाप्त करने कि दिशा में कदम उठायें. आज जिस तरह से यूपी, दिल्ली और राजस्थान पुलिस संयुक्त रूप से इस तरह के अपराधों को एक जगह जोड़कर इनमें पकडे गए लोगों के स्थानों पर छापेमारी कर रही है यदि पहले किसी घटना के होने पर ऐसा किया जाता तो संभवतः हमारे राजमार्ग और भी अधिक सुरक्षित होते. घटना से यह भी स्पष्ट है कि लुटेरे गिरोह लूटपाट करने के उद्देश्य से ही ऐसी घटनाएं करते हैं पर महिलाओं के मिल जाने पर उनके साथ घृणित कार्य करने से भी बाज़ नहीं आते हैं पर हर लुटेरा गिरोह इसी तरह से काम करता हो ऐसा भी नहीं है. नागरिकों को आसानी से एक स्थान से दूसरे स्थान पर सुरक्षित रूप से आने जाने की पूरी स्वतंत्रता के साथ सुरक्षा की गारंटी भी मिलनी ही चाहिए क्योंकि आजकल लोग बेहतर गाड़ियों और राजमार्गों के कारण रात में सफर करने को प्राथमिकताएं देने लगे हैं पर इस तरह की घटनाओं से पूरे सुरक्षा तंत्र पर ही सवालिया निशान लग जाते हैं.
यूपी जैसे राज्य की विडम्बना यही है कि गृह जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालय को कम महत्व का समझ कर उसे सीएम के पास रखने की एक परंपरा सी चल पड़ी है जिसका सीधा असर पुलिस के मनोबल पर देखा जा सकता है. सभी जानते हैं कि सीएम के पास जितने काम होते हैं उनके चलते वे इतने बड़े और महत्वपूर्ण मंत्रालय के साथ न्याय नहीं कर सकते हैं और फिर यूपी जैसे प्रदेश जहाँ बड़ी आबादी के कारण कानून व्यवस्था सदैव ही एक समस्या रहा करती हैं राजनेताओं के इस तरह के व्यवहार से और भी निचले स्तर पर पहुँच जाती है. केवल प्रशासनिक अधिकारियों के भरोसे चलने वाला गृह मंत्रालय कैसा हो सकता है यूपी उसका एक उदाहरण मात्र ही है अब सीएम अखिलेश को इस परमपरा को तोड़ते हुए किसी तेज़ तर्रार कठोर प्रशासक साबित हो चुके नेता को गृह मंत्रालय की ज़िम्मेदारी सौंप देनी चाहिए जिससे प्रदेश की जनता के लिए काम करने और जीने लायक माहौल को बनाने में मदद मिल सके. हर महत्वपूर्ण मंत्रालय अपने पास रखकर कोई भी सीएम पूरे प्रदेश के साथ न्याय नहीं कर सकता है यह बात अब समझने का समय आ गया है और आज प्रदेश की आवश्यकता भी यही है तथा दृढ इच्छाशक्ति से पुलिस के बेहतर समन्वय से प्रदेश को सुरक्षित करने का काम सही तरह से किया जा सकता है.



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