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सूखा, कोर्ट और सरकारें

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लगता है देश में बनने वाली सरकारों का सामाजिक सरोकारों से ध्यान हटता जा रहा है क्योंकि जिस तरह से सामान्य प्रशासन को चलाने के लिए देश में त्रिस्तरीय लोकतंत्र की व्यवस्था की गयी है उसके बाद भी यह चुने हुए प्रतिनिधि या उनके नेतृत्व में चलने वाली सरकारें आखिर क्यों वह सब नहीं कर पा रही हैं जिसकी आशा संविधान ने उनसे की थी ? यह मुद्दा किसी एक दल या उसकी सरकार से जुड़ा हुआ नहीं है क्योंकि विपरीत परिस्थितियों में जिस तरह से सरकारों का रवैया समस्या से आँखें मूंदने जैसा ही रहा करता है उसे देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक याचिका से जुड़े मुद्दे में सरकारों के शुतुरमुर्गी रवैये की भी आलोचना की है. साथ है उसने केंद्र सरकार के साथ राज्यों में चल रही सरकारों के लिए भी एक बड़ा प्रश्नचिन्ह लगा दिया है जिसका जवाब आज के सुविधाभोगी राजनेताओं के पास कहीं से भी उपलब्ध नहीं है क्योंकि देश को वैश्विक आर्थिक शक्ति बनाने के चक्कर में हमारे नेता पिछले कई दशकों से अपनी उन संवैधानिक ज़िम्मेदारियों को गुपचुप तरीके से हल्का करने में लगे हुए हैं जिनमें देश के गरीब और किसान आते हैं.
पिछले कुछ वर्षों से जिस तरह से देश की सामान्य समस्याओं से निपटने में हमारी विधायिका पूरी तरह से असफल ही नज़र आती है और सही नीतियां बनवाने के लिए कुछ लोग कोर्टों में जनहित याचिकाएं दखिल करने में लगे हुए हैं तो उससे क्या साबित होता है ? हमारे लोकतंत्र की मज़बूत नींव तो आज भी ठीक है पर इन लोकतंत्र के शीर्ष भवनों में बैठने वाले नेताओं में वह इच्छाशक्ति नहीं बची है जिसके दम पर कभी कम संसाधन होने के बाद भी गवर्नेंस दिखाई दिया करती थी सम्भवतः इसलिए ही रोज़ ही आम मुद्दों पर देश की कोई न कोई अदालत विधायिका पर टिप्पणी करने को मजबूर हो रही है. देश में व्याप्त सूखे को लेकर जिस तरह से सुप्रीम कोर्ट ने सीधे तौर पर केंद्र सरकार को निशाने पर लिया है उससे यही लगता है कि कहीं न कहीं से कोर्ट को भी यह लगने लगा है कि सरकार अपना दायित्व निभा पाने में पूरी तरह से विफल ही साबित हो रही है. इस टिप्पणी को केवल मोदी सरकार के खिलाफ मानकर ही खुश होने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि राज्यों में अन्य दलों की सरकारें भी कुछ अच्छा नहीं कर पा रही हैं जिसके बाद उन पर भी कोर्ट ने टिप्पणी की है तथा केंद्र सरकार को यह चेताया है कि राज्यों के हाथ खींच लेने के बाद भी केंद्र की ज़िम्मेदारियाँ कम नहीं हो जाती हैं.
इस मुद्दे पर देश के हर जनपद में जन प्रतिनिधियों की एक समिति बनायीं जानी चाहिए जो इस तरह से सूखे का वास्तविक आंकलन करने में सक्षम हो तथा जिसमें निचले स्तर के वे अधिकारी भी शामिल किये जाएँ जिन पर जनता तक राहत पहुँचाने की ज़िम्मेदारी आती है क्योंकि किसी क्षेत्र विशेष की क्या आवश्यकता है और उससे निपटने के लिए किस तरह के प्रयासों की आवश्यकता है यह तय करना आज सब ज़रूरी भी है. दिल्ली और राज्यों की राजधानियों में बैठकर ज़मीनी मसले हल कर पाना किसी भी तरह से संभव नहीं है और दुर्भाग्य से आज हमारे नेताओं ने क्षेत्र में जाना छोड़ दिया है और वे निचले स्तर के कर्मचारियों और अधिकारियों की रिपोर्ट्स पर ही पूरी तरह से निर्भर रहने लगे हैं जिससे भी इस तरह की समस्याएं सामने आती हैं. एक समय मोदी और भाजपा की आँखों की किरकिरी रही मनरेगा के बारे में कोर्ट ने जिस तरह से स्पष्ट निर्देश दिया है वह उसके लिए एक बड़ा झटका भी है क्योंकि कोर्ट ने इस मुद्दे पर यह मान लिया है कि इस योजना के माध्यम से उन लोगों को सीधे तौर पर मदद पहुंचाई जा सकती है जो आज अपने लिए दो समय की रोटी के लिए भी संघर्षरत हैं. मनरेगा के बजट के मामले में कोर्ट ने जिस तरह से कड़ी टिप्पणी की है वह सरकार के लिए और भी बड़ी चुनौती है क्योंकि उसमें ऐसा लगता है जैसे सरकार इस योजना के लिए पैसे की कमी का बहाना ही करती रहती है.

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