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राष्ट्रीय हितों पर राजनीति

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चुनावी समर के समय देश के शालीन समझे जाने वाले नेता भी किस तरह से छिछली राजनीति करने पर उतर आते हैं इसका ताज़ा सबूत केरल में चल रहे चुनावों में लीबिया में फँसी नर्सों के मुद्दे से लगाया जा सकता है जिसमें अनावश्यक रूप से विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने भी कूदकर अपनी उस प्रतिष्ठा को ही धक्का लगाया है जो अभी तक उन्होंने बनाई थी. बेशक केरल में इस बार के चुनावों में भाजपा के लिए खाता खोलना और बेहतर प्रदर्शन करना बहुत आवश्यक है पर देश की घरेलू राजनीति से इतर क्या अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर होने वाली विभिन्न घटनाओं को उस राजनीति का हिस्सा बनाया जाना चाहिए जिसकी गंदगी से आज देश का आम जन मानस खिन्न ही दिखाई देता है ? विदेशों में फंसे भारतीयों की रिहाई पर किसी भी तरह की राजनीति से बचना भी चाहिए था क्योंकि सभी जानते हैं कि वापस आने के बाद उनके बयान भी सभी लोगों तक पहुँचने वाले हैं इन नर्सों ने जिस तरह से लीबिया के भारतीय दूतावास के कर्मचारियों के रूखे रवैये कई बात की है वह पीएम और विदेश मंत्री के बयानों के एकदम से उलट ही है फिर अनावश्यक रूप से श्रेय लेने से क्या हासिल होने वाला है ?
अंतर्राष्ट्रीय मसलों पर केवल केंद्र सरकार ही अन्य देशों से बात कर सकती है और यदि इस मसले में भी उसकी तरफ से कोई पहल हुई है तो उसका स्वागत ही होना चाहिए पर उसे देश की घटिया राजनीति से अलग ही रखा जाना चाहिए क्योंकि विभिन्न देशों में कई बार इस तरह की परिस्थितियां सामने आ जाती हैं कि दूसरे देशों के नागरिकों को वहां से निकालना ही पड़ता है जिसके लिए द्विपक्षीय सम्बन्धों के साथ अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्ध भी काम आते हैं. इराक के कुवैत पर कब्ज़े के समय किस तरह से बिना किसी राजनीति के ही विश्व के सबसे बड़े बचाव अभियान को भारत ने मज़बूती से पूरा किया था वह सभी जानते हैं. केरल की इन नर्सों ने जिस तरह से भारतीय दूतावास के कर्मचारियों पर आरोप लगाए हैं उससे पता चलता है कि देश में नेताओं के बयानों और विदेशों में भारतीयों द्वारा झेले जाने वाले कष्टों का आपस में कोई तालमेल नहीं है. वापस आई नर्सों के अनुसार इस पूरे समय में वहां के स्थानीय निवासी अब्दुल जब्बार की कोशिशें ही थीं जिसके कारण उनकी सुरक्षित वापसी संभव हो सकी है.
अशांत क्षेत्रों में काम करने की परिस्थितियों के बीच अब भारत सरकार को इस बारे में स्पष्ट दिशा निर्देश जारी करने के बारे में भी सोचना चाहिए क्योंकि जब तक विश्व के इन देशों या आज शांत दिख रहे किसी देश में काम करने वाले भारतीयों की सुरक्षा को लेकर गम्भीर प्रयास नहीं किये जाएंगें तब तक हम किसी भी तरह से अपने नागरिकों की सुरक्षा के प्रति निश्चिन्त नहीं हो सकते हैं. अच्छा हो कि स्वयं पीएम मोदी इस तरह के मामलों में राजनीति करने से बचें क्योंकि जिन मामलों में कोई सही स्थिति बताने वाला नहीं है वहां तो उनके पक्ष को देश सही मान ही लेगा पर जहाँ पर पीड़ित अपनी बात रखने के लिए वापस देश में ही आने वाले हैं तो उन मामलों में गलतबयानी से खुद उनकी और सरकार के साथ देश की विश्वसनीयता पर भी सवालिया निशान लगता है जिसे किसी भी तरह से सही नहीं कहा जा सकता है. इतने बड़े मुद्दों पर चुनावी रोटियां सेंकने से केंद्र सरकार को बचना चाहिए तथा राज्यों को भी इस बात का ध्यान रखना चाहिए की उनकी किसी भी हरकत से केंद्र कई स्थिति असहज न होने पाए क्योंकि केंद्र सरकार को ही विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों पर जवाब देना पड़ता है.

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3 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Jitendra Mathur के द्वारा
May 16, 2016

मैं सहमत हूँ आशुतोष जी आपसे ।

Bhola nath Pal के द्वारा
May 16, 2016

डॉ आशुतोष जी !जब मन पहले से ही बना हो की गिलास खाली है भरे में भी भरे की ख़ुशी नहीं मिल पाती i पूर्वाग्रह मुक्त होकर लिखते तो अच्छा रहता .प्रार्थना के साथ ………..

rameshagarwal के द्वारा
May 13, 2016

जय श्री राम डॉ  आशुतोष जी  इस मामले में आपके विचारो से सहमत नहीं आप मोदी विरोधी है इसलिए बीजेपी को ही गलत सिद्ध करने की कोशिश करते लेकिन शुरुहात तो केरला के मुख्य मंत्री चांदी ने की थी शुष्मा जी ने हर भारतीय की बिना भेदभाव मदद की लेकिन केरला के मामले में जब चांदी का गलत व्यान आया तब सुषमा जी ने वक्तवय दिया आपने चांदी की निंदा नहीं की क्योंकि आप कांग्रेस पार्टी के लगते है


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