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कश्मीर सुपर -३०

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अशांत क्षेत्र होने के चलते सदैव ही कश्मीर घाटी में सेना को गलत कारणों से चर्चा में रखने की जो कोशिश पाक समर्थित अलगाववादियों और जिहाद में लगे हुए आतंकियों द्वारा की जाती रहती है उसके अतिरिक्त भी सेना की तरफ से वहां के लोगों के जन जीवन को ऊंचा उठने के जो प्रयास लगातार किये जा रहे हैं उनके प्रति कश्मीर का स्थानीय मीडिया और राष्ट्रीय मीडिया भी उपेक्षा का भाव अपनाए रखता है. यह सही है कि अशांत क्षेत्र में काम करने वाली सेना और अर्धसैनिक बलों की तरफ से कई बार अनजाने में कुछ गलत कदम भी उठा लिए जाते हैं पर उन गलत क़दमों का कभी भी समर्थन नहीं किया जाता है और जाँच के बाद दोषी पाये जाने वाले व्यक्ति के खिलाफ कड़ी कार्यवाही भी की जाती है. साथ ही देश के अन्य स्थानों की तरह कश्मीर में भी किसी भी तरह की प्राकृतिक आपदा या अन्य विपरीत परिस्थितियों में सेना की तरफ से भरपूर मदद भी की जाती है जिससे यही पता चलता है कि सेना की भूमिका केवल अशांत क्षेत्र को शांत रखने तक ही सीमित नहीं रहा करती है बल्कि आवश्यकता पड़ने पर वह नागरिक प्रशासन का सहयोग भी करती है.
कश्मीर के मेधावी छात्रों के लिए सेना ने बिहार के आनंद कुमार के सुपर-३० से प्रेरणा लेते हुए घाटी में भी आईआईटी प्रवेश परीक्षा के लिए इसी तरह की व्यवस्था करने की कोशिशि शुरू की थी जिसके आज सकारात्मक परिणाम के रूप में ३० में से १५ छात्रों को मेंस में सफलता मिल गयी है और अब वे एडवांस परीक्षा की तैयारियों में लगे हुए हैं. यह सही है कि घाटी की विपरीत परिस्थितियों के चलते १९८९ से आज तक पूरी एक पीढ़ी अलगाववादियों के दुष्चक्र में उलझकर बर्बाद हो गयी है तथा राज्य में पढ़ाई का माहौल ही नहीं बचा है. इस परिस्थिति में जब छोटे बच्चों को भी पत्थरबाजी के लिए उकसाया जा रहा हो तो बच्चों में अपना भविष्य बनाने की बात कौन करने वाला है ? सेना की तरफ से २५ वर्ष पहले शुरू किये गए ऑपरेशन सद्भावना के अच्छे परिणाम सामने आने के बाद उसकी तरफ से राज्य के प्रतिभाशाली छात्रों के लिए देश की प्रतिष्ठित परीक्षा में सफलता प्राप्त करने के लिए सुपर-३० एक बड़ा कदम साबित हो सकता है. सेना की तरफ से पूरी कोशिश की जा रही है जिसमें कश्मीर के बच्चों को खुद को हर क्षेत्र में स्थापित करने की कोशिशें शुरू की जा सकें यदि इस बार इस प्रयास से कुछ बच्चे आईआईटी में सफल होते हैं तो यह घाटी में नयी संभावनाओं को भी जन्म दे सकती है.
अलगाववाद के नाम पर जिस तरह से युवाओं को बरगलाया जा रहा है और उनके सामने केवल भारत से लड़ाई लड़ने के एकमात्र विकल्प को ही पेश किया जा रहा है उस परिस्थिति में यदि ३० बच्चे भी सेना के इस तरह के किसी भी प्रयास में भाग लेना शुरू करते हैं तो यह कश्मीर के लिए ही बेहतर भविष्य की नींव रखने का काम कर सकते हैं. आज राज्य में महबूबा सरकार के पास काम करने के अच्छे अवसर भी हैं क्योंकि उनकी बातों को अलगाववादियों से प्रभावित जगहों पर भी गम्भीरता से सुना जाता है तो इस अवसर को राज्य का माहौल बदलने के लिए उपयोग में लाया जा सकता है. महबूबा सरकार की तरफ से वे राजनैतिक कदम उठाये जाने चाहिए जिनकी आवश्यकता है और सेना तथा केंद्र सरकार इस अवसर को घाटी के माहौल को हिंसा से शिक्षा की तरफ मोड़ने का काम शुरू कर सकते हैं. सेना पर आरोप लगाने वाले भी यह अच्छी तरह से जानते हैं कि इस तरह के अशांत क्षेत्र में काम करना कितना कठिन होता है और किसी एक घटना से वर्षों की सद्भावना पर पानी फिर जाता है. कश्मीरियों को भी यह समझना होगा कि बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए अब सही दिशा में उन्हें भी कदम उठाने हैं वरना इन अच्छे क़दमों के भी सकारात्मक परिणाम सामने नहीं आ पायेंगें.

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