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गर्मी से जलते पहाड़ी जंगल

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शीतकालीन वर्षा में कमी और वनों के बारे में स्पष्ट नीति न होने के चलते आज उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर के वनों में लगातार आग का प्रकोप बढ़ता ही जा रहा है जिससे निपटने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों के साथ पूरे देश के पास कोई स्पष्ट नीति ही नहीं है जिस पर चलकर इस समस्या को कम करने के बारे में सोचा जा सके. आज जिस तरह से लगातार बढ़ते तापमान ने पूरे देश को झुलसा कर रख हुआ है और कई वर्षों बाद अप्रैल का एक बहुत गर्म महीना देखने को मिला है उससे यही लगता है कि मौसम में यदि थोड़ा सा भी परिवर्तन हो जाये तो उससे उत्पन्न होने वाली समस्याओं से निपटने की हमारी तैयारियां सभी के सामने आ जाती हैं. पहाड़ी क्षेत्रों में लगने वाली आग पर काबू पान मैदानों के मुक़ाबले कठिन होता है क्योंकि वहां पर अधिकांश स्थानों तक केवल सीमित मानवीय पहुँच ही संभव हो पाती है तथा आग आसानी से फैलती जाती है. गर्मी के समय में पतझड़ झेल चुके इन पर्वतीय जंगलों में पत्तों की मात्रा बहुत अधिक होती है और किसी भी तरह से एक बार आग लग जाने पर सूखे पड़े पत्ते ही आग में घी का काम करने लगते हैं और इनसे बचने के कोई उपाय भी लोगों के पास नहीं होते हैं.
केवल पर्वतीय क्षेत्रों में आग से निपटने के लिए अब नए सिरे से नीतियों को बनाने और एनडीआरएफ सहित केंद्रीय और राज्य स्तरीय विभिन्न एजेंसियों के बीच तालमेल बढ़ाने की कोशिशों पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए क्योंकि जब तक इन एजेंसियों के बीच बेहतर सामंजस्य नहीं होगा तब तक किसी भी परिस्थिति में वांक्षित परिणाम नहीं मिल सकते हैं. राज्य स्तरीय प्रयासों में जहाँ आम लोगों को वनों से और भी प्रभावी तरीके से जोड़ने की कोशिशें की जा सकती हैं वहीं इन जगलों के बीच में आसानी से पहुँचने वाली जगहों पर पत्तों को इकट्ठा कर खाद बनाने का काम भी स्थानीय युवाओं और महिलाओं को इससे जोड़कर किया जा सकता है जिससे एक तरफ जंगलों में इतनी अधिक मात्रा में सूखे पत्ते भी नहीं होंगें जिससे आग के फैलने की गति पर भी रोक लगने में मदद मिल सकेगी वहीं स्थानीय स्तर पर इस जैविक खाद का प्रयोग वन विभाग और कृषि विभाग के सहयोग से राज्य और देश के अन्य स्थानों में किया जा सकेगा. नीतियों को नागरिकों के हितों के साथ जोड़ने का काम करने से जहाँ जंगलों को आसानी से बचाने में मदद मिलेगी वहीं लोगों को रोजगार भी दिया जा सकेगा.
केंद्र और राज्य की राजधानी में बैठकर नीतियों का निर्धारण करने के स्थान पर अब इसे जनता से और भी अधिक जुड़ाव वाला बनाया जाना चाहिए तथा जंगलों के बीच में ही पहाड़ी नालों पर छोटे छोटे चेक डैम भी बनाए जाने के बारे में सोचना चाहिए जिनमें भरे हुए पानी का उपयोग स्थानीय स्तर पर आग बुझाने के लिए किया जा सके. इस तरह से जहाँ पानी के बहाव की रफ़्तार को कम किया जा सकेगा वहीं भूमि के कटान में भी रोक लग पायेगी. गांवों के आस पास ऐसी व्यवस्था हो पाने से मवेशियों आदि के लिए भी पीने का पानी आसानी से उपलब्ध हो पाएगा तथा इस तरह के प्रयासों से भूमि की नमी को बनाए रखने में मदद मिलेगी और आग लगने की सम्भावनाएं भी कम हो जाएंगीं. ऊँचाई वाले क्षेत्रों में शीतकाल में इनका पानी जम भी सकता है जो लेह (लद्दाख) की तरह स्थानीय स्तर पर पानी के संरक्षण को भी बढ़ावा दे सकता है जिससे गर्मियोंमें पानी की उपलब्धता बढ़ाने में मदद मिल सकती है. पहाड़ों से प्राकृतिक रूप से मिलजुल कर रहने की आवश्यकता है जबकि आज हम उनका अनावश्यक दोहन कर अपने और पर्यावरण के लिए गम्भीर समस्याएं ही उत्पन्न कर रहे हैं.

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