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पदोन्नति और आरक्षण

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आरक्षण को लेकर आज़ादी के एक दशक बाद से ही जिस तरह से वास्तविक समस्या के स्थान पर राजनीति ने मज़बूती से अपने पैर जमा लिए हैं उसके चलते आज पूरे देश में आरक्षण के नाम पर राजनीति को ही महत्व दिया जाने लगा है. आज देश में सरकारी नौकरियों में आरक्षण के कारण कम स्थान पाने के चलते विभिन्न राज्यों में इसको लेकर आंदोलन किये जा रहे हैं जिससे कानून व्यवस्था के साथ सामाजिक स्तर पर भी समस्याएं भी उत्पन्न हो रही हैं. पिछले कुछ वर्षों में यूपी में पदोन्नति में आरक्षण को लेकर कानूनी लड़ाई लड़ी गयी और सुप्रीम कोर्ट से आये निर्णय के बाद विभिन्न विभागों में पदोन्नति में आरक्षण का लाभ पाने वाले लोगों को पदावनत भी किया गया क्या उसके बाद इस मुद्दे पर राजनीति करने वालों को कुछ समझ नहीं आना चाहिए ? मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय ने भी इसी मुद्दे पर २० से अधिक याचिकाओं की सुनवाई करते हुए पदोन्नति में आरक्षण को पूरी तरह से गलत माना और २००२ के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसके चलते ऐसी व्यवस्था करने की बात मध्य प्रदेश सरकार ने की थी. चिंता की बात यह भी है कि इसी तरह के मुद्दे पर यूपी सरकार के खिलाफ निर्णय आने के बाद भी केवल राजनीति के चलते अब एमपी सरकार भी सुप्रीम कोर्ट में जाने की बात कह रही है.
सुप्रीम कोर्ट ने एक तरफ यह स्पष्ट कर दिया है कि एक बार नौकरी मिलते समय आरक्षण का लाभ पाने वाले किसी भी व्यक्ति को पदोन्नति में आरक्षण नहीं दिया जा सकता है और भोपाल हाई कोर्ट ने भी उसी बात की पुष्टि करते हुए यह निर्णय सुनाया है फिर भी एमपी सरकार केवल अपने को आरक्षण हितैषी साबित करने के लिए आगे बढ़ना चाहती जबकि उसे इस बात का एहसास भी है कि उसकी याचिका का क्या हश्र होने वाला है. अच्छा हो कि इस मुद्दे पर देश के सभी राजनैतिक दल साथ में बैठकर कोई सर्वमान्य हल निकालने की गम्भीर कोशिश करें क्योंकि जब तक राजनेताओं की तरफ से हर बात का वोटबैंक के आधार पर समर्थन किया जाता रहेगा तब तक किसी भी परिस्थिति में देश और वंचितों का सही तरह से भला नहीं हो सकता है. बेशक आरक्षण से समाज के वंचित वर्गों को आगे बढ़ाने में सफलता मिली है पर पिछले सात दशकों में क्या यह आरक्षण केवल क्रीमी लेयर तक ही नहीं सिमट गया है और उससे पूरे वंचित समाज का क्या भला हो रहा है यह आज कोई देखना भी नहीं चाहता है.
देश में आरक्षण एक दोधारी तलवार की तरह हो चुका है जिसे निपटना अब विधायिका के बस में नहीं रह गया है इसलिए नेता अपनी आरक्षण समर्थक या विरोधी छवि से बचने के लिए हर बात का निर्णय कोर्ट पर ही छोड़ देते हैं जिससे किसी एक पक्ष के नाराज़ होने की सम्भावनाएं भी समाप्त हो जाएँ. इस पूरे प्रकरण में सबसे दुर्भाग्यपूर्ण यह बात भी है कि अपने मुताबिक निर्णय न आने पर विधायिका संवैधानिक संशोधनों के माध्यम से कोर्ट के निर्णय को पलटने से भी नहीं चूकती है. यदि नेताओं और संसद के पास आरक्षण पर कोई नीति बनाने की क्षमता नहीं बची है तो उन्हें इस सत्य को स्वीकार करते हुए पूरा मामला एक संवैधानिक पीठ के सुपुर्द कर देना चाहिए जहाँ सभी पक्ष अपनी बात भी रख सकते हैं और पीठ द्वारा सबकी बातें सुनने के बाद अपना निर्णय देना आसान भी हो सकता है. कोर्ट के निर्देश के बाद किसी के लिए भी उसके खिलाफ जाना उतना आसान नहीं होने वाला है. देश के वंचितों को आरक्षण के नाम पर एक मज़बूत विकल्प मिलना ही चाहिए पर उसमें हर तरह की राजनीति को खोजने वाले नेताओं के लिए किसी भी तरह का लाभ उठाने की सम्भावनाएं भी नहीं होनी चाहिए अब इस बात की व्यवस्था करना भी आवश्यक है क्योंकि इतने बड़े मुद्दे पर एक दूसरे के पाले में समस्या को धकेलने से देश का ही नुकसान होने वाला है.

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1 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Jitendra Mathur के द्वारा
May 1, 2016

आपका दृष्टिकोण बिलकुल ठीक है आशुतोष जी ।


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