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राष्ट्रवाद-संघ और भाजपा

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देश में उग्र राष्ट्रवाद का समर्थन करने के लिए सदैव तैयार रहने वाले आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने अगले वर्ष चुनावी समर में जाने वाले और बेहद संवेदनशील राज्य यूपी की राजधानी लखनऊ में अपने बयान से भाजपा और संघ विरोधियों के लिए भी एक नयी बात कह कर चौंकाने का काम किया है. भाजपा जहाँ संघ की विचारधारा से प्रभावित पार्टी है वहीं कई बार संघ के एजेंडे कोलगू करने में उसकी तरफ से कई काम ऐसे भी किये जाते रहते हैं जिनके कारण संघ को आलोचना भी झेलनी पड़ती है. भारत माता की जय से जुड़ा हुआ विवाद भी अब इसी श्रेणी में पहुँच जाने पर संघ की तरफ से इसमें डैमेज कंट्रोल को लेकर प्रयास शुरू कर दिए गए हैं क्योंकि भाजपा के निचले स्तर के नेता अभी वह बात नहीं समझ पा रहे हैं जो सम्भवतः संघ प्रमुख की समझ में आसानी से आ चुकी है और वे भाजपा की शक्ति को यूपी चुनावों के परिप्रेक्ष्य में किसी भी तरह से कमज़ोर नहीं करने की नीति पर चल रहे हैं और असोम, पश्चिम बंगाल के साथ केरल के चुनावों में वे इसे एक मुद्दा नहीं बनना चाहते हैं जिससे अभी तक इस मुद्दे पर अति-सक्रिय भाजपाइयों के लिए समस्या ही आने वाली है.
संघ प्रमुख को यह बात अच्छे से पता है कि आने वाले चुनावों में भाजपा की तरफ से किसी भी स्तर पर उग्र राष्ट्रवाद का समर्थन करना आत्मघाती भी साबित हो सकता है क्योंकि यह कोई ऐसा मुद्दा नहीं है जिस पर लोगों से जबरिया कुछ कहलवाने का प्रयास किया जाये साथ ही महाराष्ट्र विधान सभा में जिस तरह से कांग्रेस ने विशुद्ध राजनैतिक कारणों से इस मुद्दे पर आक्रामकता दिखाई और भाजपा को अपने प्रस्ताव का समर्थन करने के लिए मजबूर कर दिया उसके बाद संघ को यह लगा कि आने वाले समय में इस मुद्दे पर कांग्रेस और अन्य दल उसकी तरह इस नीति पर चलकर इस मसले की हवा भी निकाल सकते हैं साथ ही ज़बरदस्ती इस तरह का काम करवाने को कानूनी रूप में देश की अदालतों से भी कोई समर्थन नहीं मिलने वाला है तो इस मुद्दे पर भाजपा की और भी किरकिरी हो सकती है. इस आशंका को भांपते हुए ही भागवत ने एक सोची समझी हुई रणनीति के तहत इस बात को कहा कि भारत माता की जय जबरिया नहीं बुलवाया जाना चाहिए बल्कि देश को इतना महान बनाने का काम किया जाना चाहिए कि हर नागरिक स्वतः ही इस उद्घोष को दिल से कर सके. इस विवाद को भाजपा के वरिष्ठ नेता आडवाणी पहले ही निरर्थक बता चुके हैं जिस पर उनकी भी आलोचना हो चुकी है.
इस बात में एक बात और भी है कि जिस तरह से भाजपा ने जम्मू कश्मीर में फिर से पीडीपी के साथ अपनी नीतियों के साथ समझौता करते हुए सरकार बनाने के लिए हामी भरी है उसमें पीडीपी के रुख के चलते यह बहुत ही विवादित मुद्दा भी हो सकता था जिसका राजनैतिक रूप से भाजपा को बड़ा नुकसान भी होने वाला था पर इस मुद्दे को फिलहाल आवश्यक के स्थान पर वैकल्पिक बनाकर पेश करने से जहाँ भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के लिए संकट टल गया है वहीं उसके और पीडीपी के राष्ट्रवाद में भी टकराव की आशंका समाप्त हो गयी है. आज की वास्तविक स्थिति को समझते हुए यदि संघ भी सामाजिक दबाव को महसूस करते हुए इस तरह से सामाजिक समरसता की तरफ बढ़ना चाहता है तो यह एक अच्छा कदम हो सकता है बशर्ते यह उसकी तरफ से स्थायी नीति हो वर्ना चुनावी माहौल समाप्त होने पर एक बार फिर से इसी तरह की अनावश्यक बातों को मुद्दा बनाया जाता रहेगा. इस बयान के बाद भाजपा के उन नेताओं की स्थिति बहुत अजीब हो गयी है जो अभी तक पूरी उग्रता के साथ इसे एक मुद्दा बनाना चाहते थे क्योंकि भागवत का यह स्पष्टीकरण भले ही मोदी के लिए संजीवनी का काम करे पर निचले स्तर पर कार्यकर्ताओं को नीचा दिखाने का काम तो करने ही वाला है.

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