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देश भक्ति के प्रतीक

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आज जब पूरी दुनिया गम्भीर आर्थिक संकट से जूझ रही है और भारत में भी खुद मोदी सरकार भी उससे निपटने के हर प्रयास करने में जुटी हुई है तो उस समय भी हमारा देश साल में लगभग ८ महीने चुनावी मोड में होने के चलते उन बातों से उबर ही नहीं पाता है जिनका आम आदमी से कोई वास्ता नहीं होता है. इस तरह का सोचा समझा विमर्श चलाने से जहाँ विभिन्न राजनैतिक दलों को कुछ लाभ हो जाया करता है वहीं देश का क्या और कितना नुकसान हो जाता है इस पर विचार करने के लिए किसी के पास समय ही नहीं है. देश केवल नारों प्रतीकों से ही नहीं बनता है और जिन देशों को केवल इस तरह के खोखले प्रतीकों के भरोसे ही ज़िंदा रखा जाता है वे कहीं से भी अपने उन उद्देश्यों को पूरा नहीं कर पाते हैं जिनके लिए वे खुद ही प्रयासरत रहा करते हैं. भारत में केवल विशुद्ध राजनैतिक कारणों से हर बार महत्वपूर्ण चुनावों से पहले इस तरह की सनसनी फ़ैलाने का काम किया जाता है जिसके माध्यम से वोटों का ध्रुवीकरण करने में नेताओं को आसानी हो सके और वे अपने लिए कुछ और लोकसभा, विधानसभाओं की सीटों पर जीतने का प्रबंध कर पाने में सफल हो सकें.
देश में अपनी स्थापना के समय से ही उग्र राष्ट्रवाद का समर्थन करने वाले संघ की तरफ से सदैव ही इस तरह के बयान आते ही रहते हैं जिससे वो समाज में कुछ विशेष मुद्दों पर कुछ राजनैतिक दलों को अलग अलग साबित करने की कोशिश कर सकें इसी क्रम में मोहन भागवत और असदउद्दीन ओवैसी के बीच चल रहे वाक् द्वंद से एक बार फिर वही बातें सामने आ रही हैं जिनका समाज में कोई स्थान नहीं है पर दुर्भाग्य से वह सामाजिक राजनैतिक विमर्श में महत्वपूर्ण स्थान पा लेने में सफल होती दिखाई भी दे रही हैं. देश के प्रति सम्मान प्रदर्शित करने के लिए विशेष नारों या प्रतीकों की आवश्यकता है या नहीं यही अपने आप में विमर्श का मुद्दा होना चाहिए पर मामला जबरिया नारे लगवाने और संविधान में ऐसी व्यवस्था न होने के बीच में उलझाया जा रहा है. जिन लोगों ने असदउद्दीन ओवैसी का पठानकोट मामले में संसद में बयान सुना होगा उससे उनकी राजनैतिक परिपक्वता की बात पता लग गयी होगी और उन्हें किसी भी तरह से देश विरोधी साबित नहीं किया जा सकता है पर जब वे भी अपने वोटों को बचाये रखने और कुछ अन्य वोटों के जुगाड़ में गर्दन पर छुरी रखने की बातें करते हैं तो उनकी यही परिपक्व सोच छुद्र राजनैतिक स्वार्थों की पूर्ति ही अधिक नज़र आती है.
देश के दूर दराज़ के गांवों में रहने वाले लोगों के लिए सामान्य जीवन जी पाना ही राष्ट्रभक्ति का पैमाना हो सकता है क्योंकि आज़ादी के बाद से अब तक देश के प्राकृतिक संसाधनों से परिपूर्ण राज्यों का जिस तरह से एक तरफा दोहन किया गया है वह राज्यों में नक्सल समस्या को लगातार बढ़ाने का काम ही करता हुआ नज़र आता है. क्या अपने इन लोगों की समस्याओां को राजनैतिक विमर्श से दूर करने की कोई राष्ट्रवादी कोशिश होती दिखाई देती है ? आत्महत्या करने वाले किसी किसान का परिवार आखिर क्यों और किसके लिए राष्ट्रवादी होना चाहेगा ? क्यों हम आम भारतीय नागरिक अपने पर लगाये जाने वाले हर तरह के टैक्स से बचने की कोशिशें करते हुए नज़र आते हैं ? क्यों अधिकांश भारतीय मौका मिलने पर हर तरह के सरकारी संसाधनों को चुराने की कोशिश करने से नहीं चूकता है ? क्यों हम देशभक्ति के नारों पर अपने गले की नसें तो आसानी से फुला लेते हैं पर सरकार और देश के संसाधनों के विकास के लिए लगाये गए टैक्सों पर अपने मुँह फुलाकर बैठ जाते हैं ? क्या राष्ट्रवादी नारों के बीच यह सब करते हुए हम सच्चे देशभक्त बन जाते हैं और देश सही दिशा में चल पडता है ? यह सोचने का समय किसी के पास नहीं है क्योंकि यदि ऐसे सोचा जाने लगा तो आम नागरिक सरकारों से वे तीखे सवाल पूछना शुरू कर देगा जिनका जवाब देश के नेताओं के पास होता ही नहीं है इसलिए ही समय समय पर जाति, धर्म, भाषा, और राष्ट्रभक्ति की अफीम की कुछ खुराक देना भी आवश्यक हो जाता है जिसके नशे में जनता असली मुद्दों पर कुछ सोच ही न पाये.

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