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कन्हैया का नेता बनना

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जेएनयू प्रकरण में देश को भले ही कुछ हासिल न हो पर जिस तरह से स्पष्ट बहुमत वाली भाजपा सरकार और पूरी पार्टी उस पर हमलावर हुई उससे कन्हैया को वह सब बहुत जल्दी ही मिल गया है जिसके लिए विश्विद्यालय की राजनीति करने वाला हर छात्र नेता उम्मीद लगाये बैठा रहता है. पूरे प्रकरण से दिल्ली पुलिस ने अतिउत्साह में निपटने की कोशिश की उसके बाद यही लगता है कि कहीं न कहीं उस पर भी बहुत बड़ा राजनैतिक दबाव भी था. देश के सामने संकट आने पर पुलिस को कहीं भी आने जाने की छूट दी जा सकती है पर इस मामले में जिस तरह से पुलिस ने नारेबाजी के असली दोषियों को खोजने के स्थान पर पूरे मामले को कन्हैया और जेएनयूएसयू की तरफ घुमाने की कोशिश की उसका दुष्परिणाम अब सामने आ रहा है. कन्हैया जेएनयू का निर्वाचित अध्यक्ष था उसे बुलाकर पुलिस उससे पूछ ताछ भी कर सकती थी और आने वाले समय में पुलिस से सहयोग करने के लिए स्पष्ट रूप से पाबंद भी कर सकती थी पर दिल्ली पुलिस की तरफ से किये गए हर काम का पूरी तरह से उल्टा असर ही दिखाई दिया साथ ही कुछ अतिउत्साही मीडिया वालों ने भी पूरे मामले को भटकाने की भरपूर कोशिश की जिससे असली मुद्दा कहीं गायब हो गया और नए सिरे से नए विवादों ने जन्म ले लिया.
देश में सक्रिय हर राजनैतिक दल ने अपनी संभावनाओं को तलाशते हुए कदम उठाने शुरू कर दिए थे जिसके बाद मामला इतना बढ़ गया कि संसद तक में बहस हुई पर उस बहस का क्या लाभ हुआ यह कोई नहीं बता सकता है क्योंकि सभी ने अपनी सीमाओं में रहकर दूसरे पर छिछले स्तर के आरोपों में ही समय नष्ट किया और मामला किसी और मुद्दे के सामने आने तक नेपथ्य में चला गया है. इस मामले को यदि कानून के अनुसार पुलिस ही निपटती तो संभवतः सरकार के इस तरह से काम करने पर कोई उँगलियाँ भी नहीं उठती पर जिस तरह से सरकार और भाजपा के लोगों ने इसे सीधे देशद्रोह से जोड़ने की कोशिश की और अब दिल्ली पुलिस भी सबूतों के न होने की बात कह रही है तो उससे क्या निष्कर्ष निकाला जा सकता है ? पीएम संसद में मतभेद भुलाकर आवश्यक विधायी कार्य निपटाने की अपील तो करते हैं पर साथ ही वे यह भूल भी जाते हैं कि उनकी पार्टी के लोगों को नियंत्रण में रखने से विपक्ष को संसद के अंदर और बाहर सरकार को घेरने के मुद्दे नहीं मिल सकते हैं और विपक्ष को मजबूरी में सरकार को नीतियों पर घेरने के लिए मजबूर होना पड़ेगा देश की जनता सब जानती है और उसकी आँखों में इस तरह से धूल नहीं झोंकी जा सकती है.
कन्हैया को जिस तरह से पूरे प्रकरण में अनावश्यक रूप से बलि का बकरा बनाने की कोशिशें की गयीं उसके बाद कहीं न कहीं से उसके लिए राजनैतिक रास्ते खुल ही गए हैं और चूंकि वह बोलने की कला में माहिर भी है तो अब दिल्ली में मुद्दों पर सरकार को घेरने के लिए एक और मज़बूत व्यक्ति सामने आ ही गया है. जेएनयू में रहने वाले छात्रों को भी अब इस तरह से अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर भविष्य में किसी भी देशविरोधी गतिविधि को कैंपस में रोकना ही होगा जिससे आने वाले समय में ऐसा कुछ भी न हो जो पूरे जेएनयू पर संदेह के रूप में फिर से सामने आये. भूख की बात करना अच्छा है पर कश्मीर और कश्मरियों की बात करने से पहले कन्हैया को उन निर्दोष कश्मीरी पंडितों की बात भी करनी चाहिए जिनको बिना किसी कारण के ही घाटी से निकलने पर मजबूर किया गया था. कन्हैया पर आज देश की नज़रें हैं पर किसी भी मुद्दे पर एक पक्षीय बात करने से उसकी विश्वसनीयता पर भी संकट आएगा आज यदि पूरा जेएनयू उसके साथ दिखाई दिया तो उसके पीछे यही कारण था कि सबको लग रहा कि उसे गलत तरीके से उलझाया जा रहा है पर सही मुद्दों को यदि भविष्य में एक तरफ़ा सोच के साथ आगे बढ़ाने की गलती कन्हैया की तरफ से होती है तो धूमकेतु की तरह उगने और फिर अस्त हो जाने वाले नेताओं की श्रेणी में जल्दी ही एक और नाम भी जुड़ जाने वाला है.

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2 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

jlsingh के द्वारा
March 8, 2016

कन्हैया पर आज देश की नज़रें हैं पर किसी भी मुद्दे पर एक पक्षीय बात करने से उसकी विश्वसनीयता पर भी संकट आएगा आज यदि पूरा जेएनयू उसके साथ दिखाई दिया तो उसके पीछे यही कारण था कि सबको लग रहा कि उसे गलत तरीके से उलझाया जा रहा है पर सही मुद्दों को यदि भविष्य में एक तरफ़ा सोच के साथ आगे बढ़ाने की गलती कन्हैया की तरफ से होती है तो धूमकेतु की तरह उगने और फिर अस्त हो जाने वाले नेताओं की श्रेणी में जल्दी ही एक और नाम भी जुड़ जाने वाला है.— आपसे पूरी तरह सहमत आदरणीय आशुतोष जी.

Jitendra Mathur के द्वारा
March 6, 2016

सार्थक और तर्कसम्मत विचार हैं आपके आशुतोष जी ।


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