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संसद की चर्चा

Posted On: 21 Feb, 2016 पॉलिटिकल एक्सप्रेस में

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आम बजट और रेल बजट प्रस्तुत करने के लिए बुलाये जाने वाले संसद के स्तर को लेकर अभी से आशंकाएं सामने आने लगी हैं क्योंकि दलित और राष्ट्रद्रोह के दो बड़े मुद्दों को लेकर जिस तरह से विपक्ष मोदी सरकार पर पूरी तरह हावी होने का प्रयास कर रहा है उसके चलते बजट सत्र में वास्तविक रूप में कितना विधायी कार्य संभव हो पायेगा यह समय ही बता सकता है पर सरकार और विपक्षी दलों के बीच इन मुद्दों पर चर्चा के लिए सहमति बनना ही अपने आप में बड़ी राहत भरी खबर है. इसे संसदीय लोकतंत्र की मज़बूती या कमज़ोरी कुछ भी कहा जा सकता है जब विपक्ष सरकार पर हमलावर होता है और सरकार को अपनी कुशलता से सदन को चलाना तथा विपक्ष के हमलों का जवाब भी देना पड़ता है. यह संसद अपने आप में बहुत ही महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें अधिकांश समय सरकार अपने संख्या बल के चलते लोकसभा में विपक्ष पर हावी रहने की कोशिश करती है जिससे निपटने के लिए विपक्ष राज्यसभा में सरकार की कमज़ोर संख्या के चलते उसके कामों में रोड़ा अटकाने का काम भी करता रहा है.
आज यदि सरकार वेमुला और जेएनयू विवाद पर कुछ ठोस बहस करवाना चाहती है तो विपक्ष को भी अपने मुद्दे इकट्ठे कर उन पर सार्थक बहस करने के बारे में आगे बढ़ना चाहिए. किसी भी देशद्रोह से सम्बंधित मामले में कोई भी राजनैतिक दल अपने को देश विरोधियों के साथ नहीं रखना चाहता है पर जब असली मुद्दे से हटकर बात केवल राजनीति करने तक सीमित हो चुकी हो तो हर पक्ष अपने अनुसार कुछ भी करने के लिए आमादा हो जाता है जिससे कई बार यह दिखाई देता है जैसे कि कुछ लोग देश के साथ तो कुछ लोग देश के विरुद्ध खड़े हुए हैं ? आज के दौर में जिस तरह से राजनीति केवल मुद्दों और वैचारिक स्तर से हटकर व्यक्तिगत हमलों तक पहुँच गयी है उससे यही लगता है कोई भी दल गंभीर मुद्दों पर चिंतन करके उसका हल निकालने के बारे सोचना भी नहीं चाहता है जिससे देश के सामने आज खड़े हुए ज्वलंत मुद्दे भी खोखले स्वार्थ की राजनीति की भेंट चढ़ जाया करते हैं.
वैसे उम्मीद तो कम ही है पर यदि संसद में इन विवादित मुद्दों पर गंभीर चर्चा के बाद एक मत से कोई नीति बनाई जा सके कि जिसमें इस तरह की परिस्थितियों को रोकने और आगे से इस तरह एक मुद्दों पर उसी पर चलने के बारे में सोचा जा सके तो आने वाले समय में देश को इस तरह की एक दूसरे के खिलाफ की जाने वाली नकारात्मक राजनीति से छुटकारा मिल सकता है. देश की कीमत पर इस तरह से संसद से सड़कों तक कुछ भी करने की छूट लेना लोकतंत्र का अपमान ही है जिससे सभी दलों और उनके नेताओं को पूरी तरह से बचना भी चाहिए पर इस तरह की सोच पर काम करने से आम लोगों को छोटे मुद्दों पर उलझकर बड़े मुद्दों से अलग रखने की राजनेताओं की कोशिशें भी कमज़ोर पड़ सकती हैं. देश है तो राजनीति करने के अवसर हैं और तभी राजनेता भी रह सकते हैं इसलिए देश की चुनौतियों एक लिए सभी दलों को एक राय बनाकर आगे बढ़ने के बारे में सोचना चाहिए जिससे आने वाले समय में देश के साथ न्याय किया जा सके और जनता के बीच समरसता के उस ताने बाने को मज़बूत किया जा सके जिसे समय समय पर विभिन्न मुद्दों के चलते छिन्नभिन्न करने की कोशिशें होती ही रहती हैं.

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