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एनपीए और देश

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पिछले कुछ दिनों में जिस तरह से देश के बड़े सरकारी बैंकों के संकट में फंसने की ख़बरें सामने आई हैं वे निश्चित रूप से ही सरकार और देश के लिए खतरे की घंटी ही है क्योंकि जिन बैंकों के भरोसे सरकार अपनी नीतियों को आम लोगों तक पहुँचाने का संकल्प लेती है यदि उनकी यह दुर्दशा होती रहेगी तो देश के आर्थिक परिदृश्य बड़े सपने देखने वाले कार्यक्रमों का भविष्य क्या होगा ? इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के दखल के बाद इस मोर्चे पर अब सरकार और बैंकों के लिए अपने को गलत तरीके से बचा पाने में बहुत दिक्कत होने वाली है क्योंकि अभी तक कर्जदारों एक बारे में जो भी नीतियां चल रही हैं संभवतः अब उन्हें आमूल चूल बदलने की ज़रुरत भी सामने आ खड़ी हुई है. एक तरफ जहाँ सरकारी क्षेत्र के बैंक गरीब किसानों और अन्य छोटे व्यापारियों द्वारा लिए गए क़र्ज़ के न चुका पाने पाने पर उनके नाम को अपने यहाँ प्रदर्शित करते हैं जबकि इन्हीं बैंकों के बड़े बकायेदारों और देश के बड़े उद्योगपतियों में शामिल लोगों के द्वारा क़र्ज़ वापस न देने पर उनके लिए अजीब तरह की गोपनीयता का आवरण ओढ़ लिया करते हैं ?
इस तरह से यह सामने आ रहा है कि क़र्ज़ चुका पाने में सक्षम उद्योगपति भी बैंकों के अधिकारियों के साथ मिलीभगत करके कर दाताओं की हज़ारों करोड़ रुपयों की पूँजी को ठिकाने लगाने में लगे हुए हैं और सरकार तथा बैंक किसी भी दशा में इसे वसूल पाने के इच्छुक या समर्थ भी नहीं दिखाई देते हैं. इस परिस्थिति में सुप्रीम कोर्ट ने बड़े बकायादारों की सूची सभी बैंकों से सीलबंद लिफाफे में मांगी है जिससे वह इस बात का निर्णय कर सके कि इन बड़े कर्जदारों के खिलाफ किस तरह की कार्यवाही संभव है ? कायदे से इस बात को जनता के सामने खुले तौर पर लाने की आवश्यकता थी क्योंकि जो बड़े उद्योगपति आम लोगों के पैसों को क़र्ज़ के रूप में लेकर अब देने की मंशा नहीं रख रहे हैं उनके बारे में देश को भी कुछ पता चल सके. देश के गरीबों के बारे में इस तरह कि कोई गोपनीयता नहीं महसूस की जाती है तो जनता के पैसे से क़र्ज़ लेकर मुनाफा कमाने वाले लोगों के नाम सार्वजनिक किये जाने में किस तरह से परहेज़ किया जा सकता है ? इस बारे में अब सरकार को खुद ही नए सिरे से सोचने की आवश्यकता भी है क्योंकि अभी तक जो भी गठजोड़ रहा हो पर वह देश की आर्थिक प्रगति के हित में नहीं है यह समझने का समय आ चुका है.
एनपीए पर कड़ा नियंत्रण लगाये जाने के लिए यह बहुत आवश्यक है कि अब इस मामले में लोगों की हैसियत के स्थान पर उनको एक कर्ज़दार के रूप में देखा जाये. किंगफिशर एयरलाइन्स के मामले में सरकारी क्षेत्र के १९ बैंकों के ७००० करोड़ रूपये डूब गए हैं जो कि सीधे आम करदाताओं के हक़ों पर डाके के सामान ही है पर सरकार, बैंक अधिकारियों और उद्योगपतियों के गठजोड़ के चलते यह सब लगातार होता चला आ रहा है. यदि किसी बड़े उद्योगपति को यह लगता है कि कर्जदारों की सूची में उनका नाम आने से उनकी प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचेगी तो अपने सम्मान को बचाने के लिए उन्हें अविलम्ब क़र्ज़ वापस करने के बारे में सोचना चाहिए और यदि वे इस परिस्थिति में नहीं हैं तो एक समयबद्ध कार्यक्रम के तहत उन्हें यह धनराशि लौटाने के बारे में अपनी सहमति भी देनी चाहिए. देश में मेक इन इंडिया के चलते शुरू होने वाले बहुत सारे उद्योगों में भी देश के बैंकों का बहुत सारा पैसा लगने वाला है और यदि उद्योग जगत इस सोच के साथ काम करने लगेगा कि एक यूनिट के घाटे का बहाना लगाकर दूसरे से सरकार पैसे को हड़पने का यह तरीका लम्बे समय तक चलता रहने वाला है तो वह स्थिति देश के आर्थिक स्वास्थ्य के साथ खुद उद्योगपतियों के लिए भी विनाशकारी साबित होने वाली है.

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