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भारत में मनरेगा की आवश्यकता

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अपने प्रारम्भ के ग्यारहवें वर्ष में पहुँच चुकी संप्रग सरकार द्वारा देश के ग्रामीण क्षेत्रों के विकास के साथ ही आर्थिक परिदृश्य को सुधारने के लिए शुरू की गयी महत्वाकांक्षी नरेगा (अब मनरेगा) के बारे में राजनीति से हटकर जिस तरह से सामाजिक स्तर पर केंद्र की मोदी सरकार ने सोचना शुरू कर दिया है उसके बाद यह लगने लगा है कि वैश्विक आर्थिक संकट के चलते देश पर पड़ने वाले बुरे प्रभाव से निपटने के लिए सरकार ने खुद देश के अंदर आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के पुराने रास्ते पर चलने का मन बना लिया है. यह सही है कि विश्व में वंचितों और गरीबों के लिए काम करने और सबसे बड़े आर्थिक परिवर्तन की साक्षी बनने वाली यह परियोजना विभिन्न कारणों से पूरे विश्व का ध्यान खींचने में सफल रही है और इसने वास्तव में धरातल पर बहुत बड़े परिवर्तन के लिए बुनियादी आवश्यकता की पूर्ति भी की है. देश काल और परिस्थिति के अनुसार आज भी भारत का बड़ा हिस्सा ग्रामीण क्षेत्रों में ही बस्ता है जिससे देश की आर्थिक प्रगति का इंजन वहीं से निचले स्तर से आर्थिक परिवर्तन को शुरू कर सकता है अब सरकार की समझ में यह आने भी लगा है क्योंकि आर्थिक मंच पर कमज़ोर हो रहे विश्व के सामने आने वाली मंदी भारत पर भी बुरा असर ही डालने वाली है.
विश्व के सर्वश्रेष्ठ अर्थशास्त्री लोगों में गिने जाने वाले पूर्व पीएम मनमोहन सिंह के निर्देशन में शुरू की गयी इस परियोजना ने जिस तरह से २००८ की मंदी में भी देश को उसके बुरे प्रभाव से बचाने के लिए अच्छा काम किया था संभवतः अब मोदी सरकार भी अपने पास इकठ्ठा हो रहे धन को इस रास्ते से देश की प्रगति में लगाने के बारे में निर्णय कर चुकी है. एक समय मोदी और भाजपा इस योजना के सबसे बड़े आलोचक हुआ करते थे पर उनके और भाजपा शासित राज्यों ने इस योजना का भरपूर लाभ उठाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी जिसका लाभ निश्चित तौर पर उन राज्यों की ग्रामीण जनता को मिला भी है. केवल राजनैतिक कारण से किये जाने वाले विरोध के बाद इस योजना के लाभ नज़दीक से महसूस करने के बाद जेटली और मोदी के लिए इससे पूरी तरह से दूर होना भी संभव नहीं हो पाया क्योंकि जिस तरह से राहुल गांधी अपने हर भाषण में मोदी सरकार को सूट बूट की सरकार कहने में नहीं चूकते हैं तो उस परिस्थिति में अब सरकार के लिए इस आरोप का जवाब देना भी आवश्यक बनता है और इसके लिए कल्याणकारी कार्यक्रमों को चलाये रखना भी एक आवश्यकता हो सकती है.
लैंड बिल के बाद इस मुद्दे पर सरकार को अपने कदम पीछे खींचने को लेकर दबाव में लाने की राहुल की कोशिशें कांग्रेस के लिए कितनी सहायक होंगीं ये तो समय ही बताएगा पर जनता से जुड़े मुद्दों पर इस तरह से आक्रामक होने और उनसे मिलने वाले लाभ का बखान करने का मार्ग अवश्य ही खुल गया है. देश की बेहतर प्रगति के लिए जहाँ तेज़ आर्थिक गतिविधियों की आवश्यकता तो है वहीं जब तक देश का ग्राम बाजार खुद मज़बूत नहीं होता है तब तक देश के बढ़ते औद्योगिक उत्पादन को किस तरह से खपाया जा सकता है. निर्यात की एक सीमा होती है और वैश्विक परिदृश्यों के चलते कई बार अच्छे प्रयास भी इसी तरह से कारगर नहीं हो पाते हैं. इसलिए अब मोदी सरकार ने तेज़ आर्थिक गतिविधियों के साथ देश के वंचितों और गरीबों के लिए चलायी जा रही मनरेगा जैसी परियोजना को मज़बूत करने का जो निर्णय लिए हैं वह सही दिशा में उठाया गया कदम है. यह भी सही है कि राज्यों के स्तर पर इनमें बहुत अधिक भ्रष्टाचार भी किया गया है तो उसे रोकने के लिए एक नए कारगर तंत्र की व्यवस्था करने की आवश्यकता भी है जिसमें प्रधानों से लगाकर अधिकारियों तक को ज़िम्मेदार ठहराया जा सके जिससे वास्तविक रूप से भ्रष्टाचार को कम करने में सफलता मिले और देश की आर्थिक प्रगति को वो आयाम मिल सकें जो मनमोहन सिंह का सपना था और अब जिसे नरेंद्र मोदी ने पूरा करने की दिशा में कदम उठा दिया है.

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