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अल्पसंख्यक की परिभाषा

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पंजाब में एसजीपीसी से जुड़े एक मामले में सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने जिस तरह से केंद्र सरकार से यह स्पष्ट करने को कहा है कि क्या सिखों को पंजाब में अल्पसंख्यक माना जा सकता है क्योंकि एसजीपीसी से जुड़े हुए विद्यालयों में सिख छात्रों को अल्पसंख्यक संस्थान होने के कारण दिए जाने वाले आरक्षण पर इससे असर पड़ सकता है. अभी तक इस बात पर कभी भी विचार ही नहीं किया गया है पर पंजाब राज्य ने १३ अप्रैल २००१ में एक नोटिफिकेशन में एसजीपीसी द्वारा चलाये जा रहे शिक्षण संस्थानों को अल्पसंख्यक संस्थान का दर्ज़ा दे दिया था जिसके बाद से ही इस मुद्दे पर विचार चल रहा है और मामला पंजाब हरियाणा उच्च न्यायालय के पास भी पहुंचा जिसने २००७ में सरकार के इस आदेश पर रोक लगा दी थी. एसजीपीसी की तरफ से यह मामला सुप्रीम कोर्ट में ले जाए जाने के बाद अब उसकी सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार की राय जानने के लिए कोर्ट ने उससे भी यह सवाल पूछा है. देखने में यह सवाल छोटा लगता है पर यदि सुप्रीम कोर्ट ने इस पर कोई बड़ा निर्णय दिया तो इसका असर पूरे देश के अल्पसंख्यक संस्थानों पर भी पड़ सकता है क्योंकि इस वर्तमान व्यवस्था में इस तरह के अल्पसंख्यक संस्थान अपने समुदाय के लिए ८०% तक सीटें आरक्षित करने के लिए पात्र हो जाते हैं.
आज़ादी के समय जिस पैमाने के चलते देश में अलसंख्यक बहुसंख्यक की परिभाषा निर्धारित की गयी थी आज समय बीतने के साथ वह अपने आप में गलत साबित होती दिखाई दे रही है क्योंकि मुस्लिम, सिख और अन्य धार्मिक समूह जहाँ अखिल भारतीय स्तर पर जहाँ अल्पसंख्यक हैं वहीं जम्मू-कश्मीर, पंजाब और नागालैंड के मामले में वे किसी भी तरह से अल्पसंख्यक नहीं कहे जा सकते हैं. इस सवाल का जवाब दे पाना केंद्र के लिए भी बहुत पेचीदा ही होने वाला है क्योंकि जिस राज्य में किसी अखिल भारतीय स्तर पर अल्पसख्यक घोषित धर्म की आबादी सबसे अधिक हो उसे किस तरह से अल्पसंख्यक घोषित किया जा सकता है तथा देश के संसाधनों पर उनके स्थानीय आधार पर प्रभावी होने के बाद भी उन्हें अलसंख्यक कैसे माना जा सकता है ? निश्चित तौर पर यह मसला ऐसा है कि इससे निपटने के स्थान पर इसे सूझबूझ से सुलझाये जाने की आवश्यकता अधिक है. इस परिस्थिति में जब तक सरकार सभी विकल्पों पर विचार कर अपनी राय कोर्ट को देती हैं तब तक सभी पहलुओं पर भी देश एक भविष्य को ध्यान में रखते हुए कार्यवाही करने की बात सोचने का समय आ गया है जिससे अब टाल मटोल कर बचा नहीं जा सकता है.
इस मामले में क्या सिखों के साथ अन्य अल्पसंख्यक घोषित समुदायों के साथ भी पुनर्विचार किये जाने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि अब अल्पसंख्यकों के परिप्रेक्ष्य में अखिल भारतीय पैमाने के उपयोग से क्या राज्यों में वास्तविक अल्पसंख्यकों के साथ न्याय किया जा सकेगा ? जम्मू कश्मीर के मामले में पहले से ही सरकार बनाने में आये गतिरोध के चलते मोदी सरकार के लिए इस तरह का निर्णय लेना आसान नहीं होने वाला है और पंजाब में आसन्न चुनावों के चलते सरकार वहां के सिखों को कितना नाराज़ कर पाने की हिम्मत दिखाती है यह भी देखने का विषय होगा. क्या इस तरह के संस्थानों से इनको चलाने वाले समुदायों का वास्तविक रूप से भला हुआ है और क्या इस व्यवस्था के चलते राज्यों में रहने वाले वास्तविक अल्पसंख्यकों पर भी इसका कोई विपरीत असर पड़ा है आज इस बात पर विचार किये जाने की बहुत आवश्यकता है. समाज के हर वर्ग की आवश्यकताओं के अनुरूप देश के संसाधनों के बंटवारे की बात और उसके सदुपयोग के बारे में सोचना अब सरकार का ही काम है. समाज में जो भी किसी स्तर पर वंचित है अब देश के संसाधनों को उसके लिए उपलब्ध कराने के बारे में विचार करना चाहिए जिससे समाज के उत्थान के लिए चलायी जाने वाली ऐसी योजनाएं समाज में विभाजनकारी न साबित होने लगें.

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1 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shobha के द्वारा
January 19, 2016

श्री शुक्ल जी राज नेताओं की नजर में अल्पसंख्यक वह जो उनका वोट बैंक बन सके अच्छा विषय


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