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देश का आर्थिक परिदृश्य

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देश में राजनैतिक कारणों से जहाँ वैश्विक आवश्यकता के अनुरूप बहुत सारे बड़े सुधारात्मक परिवर्तन करने के लिए मुख्य राजनैतिक दल कांग्रेस और भाजपा के बीच रस्सा कशी के चलते रोड़े अटकते ही रहते हैं उसी परिस्थिति में आज चीन के चलते सामने आ रही वैश्विक मंदी के कारण देश पर भी उसका असर पड़ना शुरू हो चुका है. आज जिस तरह से पूरे विश्व में आर्थिक गतिविधियों में गिरावट देखी जा रही है और मई २०१४ में मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद सरकार की तरफ से आवश्यक आर्थिक सुधारों को लेकर जिस आशा और विश्वास का प्रदर्शन किया गया था आज वह उसमें कहीं से भी खरी उतरती नहीं दिख रही है. यह देश के लिए एक ऐसा समय है जिससे बच पाने का कोई रास्ता अभी दिखाई भी नहीं दे रहा है.जिन सुधारों के भरोसे सरकार देश की आर्थिक स्थिति को बदलना चाहती है आज इन सुधारों को लागू कर चुके देश भी गंभीर संकट से जूझ रहे हैं और इस तरह के सुधारों को ही भारत की उच्च आर्थिक प्रगति के लिए अंतिम नहीं माना जा सकता है क्योंकि घरेलू आर्थिक परिदृश्य के अनुरूप व्यवस्था को न ढालने का दुष्परिणाम भविष्य में देश को भुगतना ही पड़ेगा.
मूलतः कृषि पर आधारित भारतीय अर्थ व्यवस्था के लिए क्या विदेशों में अपनाये जा रहे किसी भी मॉडल से राहत लायी जा सकती है सबसे पहले इस पर गंभीर विचार आवश्यक है क्योंकि सरकार में चाहे कोई भी दल हो पर देश की आर्थिक संरचना से कोई भी इंकार नहीं कर सकता है. भारत यदि २००८ की मंदी की चपेट में बुरी तरह से आने से बच गया था तो उसका मुख्य कारण हमारी मिश्रित अर्थव्यवस्था भी थी क्योंकि अंतर्राष्ट्रीय स्तर से मांग में कमी आने की स्थिति में घरेलू बाज़ार ने भी देश की न्यूनतम आर्थिक गतिविधियों को जीवंत बनाये रखा जिससे देश ने यदि उस दौर में कुछ ख़ास पाया नहीं तो उसके पास खोने के नाम पर भी कुछ नहीं गया. हमारे देश के किसानों की स्थिति सुधारने के लिए अब सही दिशा में राष्ट्रीय नीति के माध्यम से कदम उठाने की आवश्यकता है क्योंकि जब तक हम अपने देश की कृषक आबादी की क्रय शक्ति को बेहतर नहीं कर पाते हैं तब तक हमारे उद्योगों के लिये केवल निर्यात पर टिके रहकर चल पाना संभव नहीं रहने वाला है. इस स्थिति में परिवर्तन अब बहुत आवश्यक है और सिक्किम में केंद्र सरकार इस विषय पर जो मंथन करने जा रही है उसके बेहतर परिणाम सामने आने की पूरी सम्भावना भी है.
आज सरकार और नीति आयोग द्वारा जिस तरह से आर्थिक विकास दर के ८% तक जाने की जो आशा दिखाई जा रही है उससे यही लगता है कि सरकार ने केवल अपनी बात को आगे रखने की कसम खा रखी है क्योंकि निर्यात दर और अन्य सूचकांक कहीं से भी अर्थव्यवस्था में सुधार के संकेत नहीं दिखा रहे हैं और इन आंकड़ों से ज़्यादा असर बाज़ार पर दिखाई दे रहा है. अच्छा हो कि सरकार इस तरह के आंकड़ों में उलझने के स्थान पर अब संसद से लगाकर संसदीय समितियों तक में इस बात पर गंभीर चर्चा शुरू करे क्योंकि आज विपक्ष के पास करने के लिए बहुत कुछ नहीं है तो इस स्थिति में पहल सरकार को ही करनी होगी. महत्वपूर्ण बिलों पर दबाव के साथ आगे बढ़ने के स्थान पर विमर्श पर अधिक ध्यान दिए जाने की आवश्यकता भी है क्योंकि राजनैतिक कारणों से किये जाने वाले विरोध को साथ में बैठकर सुलझाने से ही नीतिगत सुधार किये जा सकते हैं. अब देश के नेताओं को दलीय राजनीति से आगे बढ़कर यह देखना ही होगा कि इस समस्या से किस तरह से निपटा जा सकता है. राजनीति करने के लिए अन्य बहुत से अवसर भी हैं पर सत्ता और विपक्ष में हावी होने की राजनीति से देश का किसी भी तरह से भला नहीं होने वाला है.

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