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सोनपुर मेले की सामुदायिक पुलिस

Posted On: 22 Dec, 2015 social issues में

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विश्व प्रसिद्द सोनपुर मेले में आम लोगों के साथ होने वाली ठगी और बच्चों के खोने से सम्बंधित मामलों से निपटने के लिए २००८ में वहां के तत्कालीन एसपी प्रणतोष् दास ने मेले के लिए सामुदायिक पुलिस की अवधारणा पर काम करना शुरू किया था जिसके फलस्वरूप आज इस मेले में ४५१ स्वयंसेवकों की टोली मेला देखने आये आम लोगों की परेशानियों को दूर करने में लगी हुई है. अपने गठन के पहले वर्ष में ही जिस तरह से इस सामुदायिक पुलिस ने बेहतर तरीके से काम करना शुरू किया है वह मेला प्रशासन के लिए बहुत ही लाभकारी सिद्ध हुआ है क्योंकि इतने बड़े मेले में लोगों के साथ कई तरह की चोरी और ठगने जैसी घटनाएँ इस मेले में लगातार होती ही रहती थीं पर इस तरह से इस पर रोक लगाने की तरफ एक बड़ा कदम उठाने में सहायता मिल चुकी है. मेले में आने वाले लोग भी इस प्रयास से पूरी तरह से संतुष्ट दिखाई देते हैं क्योंकि उनको इससे होने वाली सुविधाओं के चलते बहुत लाभ मिल रहा है. बीते साल लगभग ३२०० बच्चों को भी इसके प्रयास से पूरे मेले के दौरान अपने अभिभावकों से मिलवाने में सफलता मिली थी.
छोटे स्तर पर शुरू किये गए इस प्रयास को लेकर जिस तरह के परिणाम सामने आये हैं उनको एक उदाहरण के रूप में पूरे देश में लागू किया जा सकता है क्योंकि देश भर में विभिन्न स्थानों पर लगने वाले इस तरह के मेलों में ऐसी समस्याएं सामने आती ही रहती हैं जिनसे पुलिस की कमी के चलते सामान्य रूप से निपट पाना संभव नहीं होता है. ऐसी परिस्थिति में अब राज्य सरकारों को स्थानीय स्तर पर नागरिकों के प्रयास से ऐसी गतिविधियों को बढ़ावा देने के बारे में सोचना चाहिए क्योंकि जब तक जन सामान्य को इस गतिविधि से सरोकार जोड़ने की तरफ प्रयास नहीं किये जायेंगें तब तक मेलों में व्यापार करने आये लोगों द्वारा अपनी मनमानी करने की घटनाएँ लगातार दिखाई देती रह सकती हैं. इस तरह से समाज के ऊर्जावान युवाओं को मेलों के माध्यम से पूरी सामाजिक प्रक्रिया में भागीदारी सुनिश्चित करने की तरफ आसानी से मोड़ा जा सकता है और जब अपराधियों को यह पता चल जायेगा कि उन पर कुछ अदृश्य लोग भी नज़रें गड़ाए हुए हैं तो वे इस तरह के सामाजिक आयोजनों से अपने को दूर करने के बारे में सोचना शुरू कर देंगें.
हर जिले में इस तरह एक प्रयोग किये जा सकते हैं और सिविल डिफेंस के माध्यम से स्वयंसेवों को विभिन्न परिस्थितियों से निपटने का पूरा प्रशिक्षण भी दिया जा सकता है. देश के हर ज़िले, शहर और तहसीलों में किसी न किसी तरह के मेले लगाने का प्रचलन सदैव से ही रहा है यदि प्रत्येक ज़िले में युवाओं को इस तरह से तैयार किया जाये कि वे इन आयोजनों के साथ प्राकृतिक आपदा राहत से जुड़े हुए कामों का प्रशिक्षण भी प्राप्त कर सकें तो आने वाले दिनों में पूरे देश के पास स्वयंसेवकों की बहुत बड़ी संख्या उपलब्ध हो सकती है जो समय आने पर स्थानीय पुलिस का हाथ बांटने के साथ जनता को राहत भी पहुंचा सकती है. देश में जिस तरह से लगभग हर राज्य की पुलिस अपने सीमित संसाधनों के चलते अपराधियों से निपट पाने में कठिनता महसूस कर रही यहीं तो उस परिस्थिति में यदि ऐसे प्रयासों से देश सेवा के लिए अप्पने कुछ घंटे निकाल सकने वाले युवाओं को सामने लाने के ठोस प्रयास किये जाएँ तो पूरे देश में सामाजिक कर्तव्यों को निभाने में पुलिस के साथ इनका सहयोग दिखाई दे सकता है पर इसके लिए दृढ इच्छाशक्ति के साथ आगे बढ़ने और निर्णय लेने की आवश्यकता है जिसका आज पूरी तरह से अभाव दिखाई देता है.

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