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पुलिस अधिकारियों की सालाना कॉन्फरेंस

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देश भर के आला पुलिस अधिकारियों की सालाना कॉन्फरेंस इस बार गुजरात के सीमावर्ती क्षेत्र में आयोजित की गयी है जिसमें सभी राज्यों के पुलिस प्रमुखों समेत वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी भाग लिया करते हैं. इस कॉन्फरेंस को आज़ादी के बाद शुरू किया गया था जिसका उद्देश्य देश भर की पुलिस के सामने आने वाली चुनौतियों को एक मंच पर साझा करते हुए उनसे निपटने और देश में शांति बनाये रखना था. इस बार भी यह सम्मलेन शुरू हो चुका है और पीएम, गृह मंत्री के साथ अन्य विशिष्ट लोग भी इसमें मंथन करने वाले हैं सम्मलेन का उद्घाटन भाषण देते हुए जब केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह इसके केंद्र में आतंकवाद और जम्म-कश्मीर समेत पूर्वोत्तर पर ध्यान होने की बात करते हैं तो उनकी सरकार का खोखलापन भी दिखाई दे जाता है क्योंकि जिस जम्मू-कश्मीर पर वे चर्चा करना चाहते हैं वहां से पीडीपी-भाजपा सरकार ने अपने डीजीपी के. राजिंद्रन और आईजी अब्दुल गनी मीर को पहले स्वीकृति देने के बाद भाग लेने के लिए ही नहीं भेजा है और इस मामले पर जम्मू-कश्मीर सरकार का क्या रुख है यह भी आधिकारिक तौर पर अभी तक उसकी तरफ से स्पष्ट नहीं किया गया है.
पूरी दुनिया जानती है कि भारत में आतंक से सबसे अधिक प्रभावित राज्य जम्मू-कश्मीर ही है पर जब अपनी वार्षिक कॉन्फरेंस में जब देश की पुलिस के शीर्ष अधिकारी आतंकवाद पर चर्चा करने के लिए बैठते हैं तो उसमें उस राज्य के किसी भी शीर्ष अधिकारी की शिरकत दिखाई ही नहीं देती है तो उस परिस्थिति में क्या जम्मू-कश्मीर के हालात और आतंकवाद पर सार्थक चर्चा संभव भी है यह तो केंद्र की वैश्विक स्तर पर आतंवाद पर हमला करने वाली मोदी सरकार को सोचना ही चाहिए था ? यदि जम्मू-कश्मीर में किसी भी अन्य दल की सरकार होती तो क्या केंद्रीय गृह मंत्री और पीएम इस तरह से इस मसले पर चुप्पी लगाते और क्या टीवी चॅनेल्स पर हल्ला मचाने वाले भाजपाई प्रवक्ता इस मुद्दे पर इसी तरह से चुप रह जाते ? मुफ़्ती के नेतृत्व में भाजपा की साझा सरकार को इस मुद्दे पर गंभीरता के साथ सोचना भी चाहिए था क्योंकि कश्मीर में हालत चाहे जैसे भी हों पर क्या इस तरह से स्थानीय कारणों के चलते इतनी महत्वपूर्ण राष्ट्रीय कॉन्फरेंस से राज्य के प्रतिनिधित्व को अनदेखा किया जा सकता है और क्या राष्ट्रवादी भाजपा का वर्तमान संस्करण इसे सही भी मानता है ?
इसी कॉन्फरेंस में गृह मंत्री यह बयान देते हैं कि जम्मू-कश्मीर समेत पूर्वोत्तर में हालात में काफी सुधार आया है और दूसरी तरफ राज्य सरकार बिना कारण बताये इतनी महत्वपूर्ण बैठक में अपने पुलिस अधिकारियों को अंतिम समय पर मना कर देती है तो दोनों में से कौन सही है यह बता पाना बहुत ही मुश्किल है. यदि जम्मू-कश्मीर के हालत पहले से अच्छे हो गए हैं तो के. राजिंद्रन गुजरात क्यों नहीं भेजे गए और यदि वहां हालात इतने ख़राब हैं कि राज्य सरकार अपने पुलिस प्रमुख के साथ कुछ आला अधिकारियों को केवल तीन दिनों के लिए राज्य से बाहर भी नहीं भेज सकते हैं तो किसको सही माना जाये ? यदि वास्तव में वहां के हालात इतने ख़राब हैं गृह मंत्री किस दम पर स्थिति सुधारने के दावे करने में लगे हुए हैं या यह भी संभव है कि पीडीपी-भाजपा गठबंधन में कहीं न कहीं कुछ ऐसा भी चल रहा है जो सब सामने नहीं आ पा रहा है और संभवतः मोदी को दबाव में रखने के लिए ही मुफ़्ती ने अंतिम समय में इस तरह का निर्णय लिया है. जम्मू-कश्मीर में केवल सत्ता में साझीदार बनने के लिए जिस तरह से भाजपा ने अपने श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बलिदान की अनदेखी की वह आज किसी से भी छिपी नहीं है और अब भाजपा संभवतः उसी निर्णय का भुगतान करने में लगी हुई है.

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