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मोदी की प्राथमिकता और विज्ञान

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एक तरफ जहाँ संघ और भाजपा स्वदेसी का राग गाने में कोई कसर नहीं रखते हैं वहीं दूसरी तरफ आज के वैज्ञानिक युग के अनुरूप भारतीय मेधा को आगे विकसित करने के लिए उनके द्वारा किये जा रहे कामों के चलते अब ऐसा लगने लगा है कि मोदी पूरे देश को असेम्बली करने वाले एक बड़े कारखाने में बदलना चाहते हैं जहाँ केवल “मेक इन इंडिया” के नाम पर विदेशी कंपनियां आयेंगीं और उन भारतीयों को केवल फिटर बनाकर ही अपना काम करने में लगी रहेंगीं जिनको अपने देश की बेहतर शिक्षा के दम पर बहुत आगे तक भी ले जाया जा सकता है. आज जब मोदी को देश की सत्ता संभाले डेढ़ साल हो चुका है तो इतने लम्बे अंतराल के बाद भी अभी तक पीएम की वैज्ञानिक सलाहकार परिषद का गठन नहीं किया जा सका है जो मोदी और सरकार की विज्ञान के प्रति वास्तविक सोच को ही दर्शाता है क्योंकि देश में वैसे ही अनुसन्धान के स्तर पर अभी भी उतना काम नहीं हुआ है जितने की आवश्यकता थी तो विज्ञान के प्रति मोदी सरकार की यह उपेक्षा भरी सोच आखिर देश के वैज्ञानिकों को किस तरह से देश के विकास के लिए काम करने के लिए प्रेरित कर पायेगी ?
इस बात को केवल मोदी की आलोचना के सन्दर्भ में देखा जाना कहीं से भी इससे न्याय नहीं कर पायेगा क्योंकि यूजीसी समेत कई बड़े संस्थानों के बजट में मोदी के सत्ता सँभालने के बाद लगभग ५०% की कटौती कर दी गयी है और इससे भी अधिक चिंतनीय यह है कि आईसीएमआर ने आधिकारिक रूप से यह घोषणा कर रखी है कि उनके पास नए शोधों पर काम करने के लिए बजट ही नहीं है. देश के विकास और वैज्ञानिक सोच को विकसित करने के लिए जिस तरह से आईआईटी की स्थापना और उनका विस्तार किया गया था आज बजट की कमी से उनके भविष्य पर क्या प्रभाव पड़ने वाला है क्या सरकार को यह सब बताने की आवश्यकता नहीं है ? इस पूरे प्रकरण में सबसे अधिक चिंतनीय बात तो यह भी है कि देश के विकास और स्वदेशी तकनीक को विकसित करने के लिए अभी तक चल रही धीमी प्रक्रिया भी इससे पूरी तरह से बाधित हो सकती है आखिर जिन वैज्ञानिक उपब्धियों को आज भारत सरकार देश की उपलब्धि बताते हुए आगे बढ़ने में लगी हुई है क्या आगे के लिए उनको और विकसित करने की तरफ सोचने की आवश्यकता नहीं है ?
अच्छा होता कि मेक इन इंडिया की जगह मेक बाय इंडिया मोदी सरकार का नारा होता क्योंकि आज जिस तरह से केवल अन्य देशों की उन्नत तकनीक को हासिल करके देश के उत्पादन सेक्टर पर मोदी सरकार का पूरा ध्यान लगा हुआ है वह निश्चित तौर पर वैश्विक मंदी के इस युग में बहुत घातक साबित हो सकता है. आज जब मंदी ने चीन तक को परेशान कर रखा है पर भारत परेशान नहीं है तो उसके पीछे का मुख्य कारण भारत के उत्पादन का अधिकांश हिस्सा देश में ही उपयोग में लाया जाना भी है पर आज विकास की अंधी दौड़ में जब हम हज़ारों करोड़ के विदेशी निवेश और वैश्विक बाज़ार के बूते अपनी प्रगति की आधारशिला फिर से रखने की तरफ बढ़ रहे हैं तो क्या हमें एक बार फिर से विचार करने की आवश्यकता नहीं है ? देश में वैज्ञानिक सोच आगे बढे और उसका समुचित लाभ देश की तकनीक के माध्यम से हो सके तो सही रूप में भारत की प्रगति हो सकती है. अपने निर्णयों के लिए संघ और भाजपा के निशाने पर रहने वाले पूर्व पीएम राजीव गांधी ने यदि अस्सी के दशक में ही देश को इक्कीसवीं सदी के अनुरूप विज्ञान के साथ कदमताल करने लायक न बनाया होता तो क्या आज टीसीएस, विप्रो जैसी कंपनियां दुनिया भर में भारतीय मेधा और परिश्रम की कहानी कह रही होतीं और क्या मोदी डिजिटल इंडिया के सपने के बारे में सोच भी सकते थे ? राजनैतिक, सामाजिक रूप से मोदी सरकार के पास करने के लिए बहुत कुछ है तो उसे कम से कम विज्ञानक जगत में अपनी सोच का विस्तार बजट में कटौती के माध्यम से नहीं करना चाहिए.

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