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नेपाल की अनदेखी

***.......सीधी खरी बात.......***
***.......सीधी खरी बात.......***
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२० सितम्बर को नेपाल द्वारा अपने नए संविधान को अस्तित्व में लाये जाने के बाद से ही जिस तरह से भारत के साथ उसके सम्बन्ध लगातार निचले स्तर पर पहुँचते जा रहे हैं उससे यही लगता है कि मोदी सरकार इस मामले में कहीं न कहीं कुछ ऐसा सोचकर बैठी है जिससे वह नेपाल को सबक भी सीखना चाह रही है. इतने महत्वपूर्ण पडोसी देश जिसके साथ हज़ारों वर्षों के सम्बन्ध रहे हों कुछ मुद्दों पर भारत की तरफ से की जाने वाली ऐसी अनदेखी नेपाल को मजबूरी में चीन के और भी नज़दीक धकेलने का काम कर रही है और सामरिक रूप से नेपाल भारत के लिए जितना महत्वपूर्ण है उससे किसी भी तरह के ख़राब सम्बन्ध भारत के लिए सुरक्षा सम्बन्धी नयी चिंताएं ही सामने लेकर आने वाले हैं १९९९ में कंधार कांड के विमान का अपहरण काठमांडू से ही किया गया था और कश्मीर के साथ देश के अन्य हिस्सों में आईएसआई के मॉड्यूल भी नेपाल के रास्ते से आते जाते रहते हैं और भारत की सुरक्षा के लिए खतरा बनते रहते हैं तो इतने महत्वपूर्ण स्तर के पडोसी होने के बाद क्या भारत सरकार का रवैय्या नेपाल के प्रति सही कहा जा सकता है ?
नेपाल की तराई में जिस तरह से पेट्रोल तस्करों का पीछा करते हुए नेपाली सीमा में दाखिल हुए एसएसबी के जवानों को बंधक बना लिया गया क्या वह समस्याओं की चरम परिणीति की तरफ इशारा नहीं कर रहा है ? क्या गृह मंत्री और विदेश मंत्री के साथ भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को नेपाल के ऐसे हालात से कोई खतरा दिखाई नहीं देता है और आखिर ऐसा क्या कारण है जो भारत सरकार इतने महत्वपूर्ण मुद्दे पर मधेशियों को वह सब करने दे रही है जो वे करना चाह रहे हैं. इससे जहाँ भारत की तटस्थ भूमिका के बारे में आम नेपालियों को संदेह होना शुरू हो चुका है वहीं भारत की तरफ से इस मसले को उतनी गंभीरता से भी नहीं लिया जा रहा है.मधेशियों द्वारा जिस तरह से रास्तों को बंद करके पहाडी जनपदों के लिए आवश्यक वस्तुओं की कमी को बढ़ावा दिया जा रहा है वह किसी भी तरह से सही नहीं कहा जा सकता है क्योंकि नेपाल लैंडलॉक देश होने के चलते अंतर्राष्ट्रीय कानूनों के अंतर्गत भारत से विशेष सुविधाएँ पाने का हक़दार भी है और उसके अपने संविधान के विरोध में भारत उसकी आवश्यकताओं के प्रति इस तरह से चुप नहीं बैठा रह सकता है.
अब समय आ गया है कि भारत सरकार सीधे नेपाल सरकार से इस मुद्दे पर बातचीत करे क्योंकि लम्बे समय तक चलने वाले इस आंदोलन से जहाँ नेपाल के आम नागरिकों को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है वहीं दोनों देशों के सम्बन्ध भी अपने सबसे बुरे दौर से गुज़र रहे हैं. इसी वर्ष भूकम्प में भारत की त्वरित प्रतिक्रिया का जितना स्वागत आम नेपालियों ने किया था उसके बाद भारत सरकार के प्रचार पाने के नुस्खे के चलते वह अपना लंबे समय तक प्रभाव भी नहीं दिखा पाया. बेशक नेपाल चीन से अपनी ज़रूरतों के सामान लाने की कोशिशें करने में लगा है पर उस तरफ से भौगोलिक परिस्थितयां भारत जैसी न होने के कारण आज सामान की ढुलाई में समस्याएं आ रही हैं पर चीन अपने दीर्घकालिक हितों की जिस तरह से रक्षा किया करता है उस परिस्थिति में यदि आने वाले समय में नेपाल सीमा तक सामान की सप्लाई करने के लिए उसकी तरफ सुगम रास्तों के निर्माण के बारे में निश्चित तौर पर सोचा ही जाने वाला है तो क्या भारत उस परिस्थिति में चीन की नेपाल की तराई तक होने वाली संभावित पहुँच के बारे में आज कुछ सोच भी रहा है ? अंतर्राष्ट्रीय मुद्दों को समझने के साथ अपने पड़ोस के इस मसले को स्थायी रूप से सुलझाने के बारे में अब मोदी सरकार को कड़े कदम उठाने ही होंगें.

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