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संसद में "काम नहीं तो वेतन नहीं" क्यों न लागू हो ?

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देश की संसद को अराजकता का अड्डा बनाने की कोशिशों में किसी भी दल की कोई सीमा नहीं है क्योंकि अपने स्वार्थों और सत्ता को घेरने के लिए यह काम अब लगभग हर लोकसभा में प्रमुखता के साथ किया जाने लगा है. क्या देश की जनता को यह पता भी है कि सरकार इन माननीयों पर कितना अनाप शनाप खर्च किया करती है क्योंकि यह सब गुपचुप तरीके से किया जाता है तथा इस पर कोई भी बड़ा समाचार भी सामने नहीं आता है. देश को सूचना के अधिकार का आभारी होना चाहिए जिससे आज इस तरह के कुछ समाचार हमारे तक पहुँचने भी लगे हैं. संसद के हंगामे के बीच ही सांसदों को लैपटॉप कम्प्यूटर खरीदने के लिए दी जाने वाली सहायता को तीन लाख रूपये करने के लिए बनायीं गयी तदर्थ समिति ने इस मांग पर मोहर लगा दी है जिससे यह पता चलता है कि सरकारें इस तरह के मामलों में कितनी लापरवाही से काम करती हैं. एक पुरानी कहावत है कि दूसरों को सुधारने से पहले वह अपेक्षित सुधार खुद में भी दिखाई देना चाहिए पर सरकार आम लोगों से तो विभिन्न सरकारी सुविधाओं को खुद ही छोड़ने की बातें करने में नहीं चूकती है पर जब उसे खुद कुछ करना होता है तो वह पानी कि तरह पैसा बहाने में लगी रहती है. तीन लाख रुपयों तक के बजट से लैपटॉप/ कम्प्यूटर और उससे जुडी अन्य सामग्री से हमारे माननीय किस तरह का काम करने वाले हैं यह किसी की भी समझ से पर ही है क्योंकि जब तक हर क्षेत्र में एक जैसा नियंत्रण नहीं होगा तो केवल बयान बाज़ी से देश का कुछ भी लाभ नहीं होने वाला है.
मानसून सत्र का पहला हफ्ता अराजकता की भेंट चढ़ा गया है उसके पीछे जो भी कारण हैं उनका ज़िक्र इस मामले में करना प्रासंगिक नहीं है पर केंद्रीय स्तर पर जिस तरह से बिना काम के ही माननीयों को भत्ते रेवड़ी की तरह बांटे जा रहे हैं उनका क्या औचित्य है ? यदि पीएम गंभीर हैं तो उन्हें इस बारे में एक संविधान संशोधन भी सदन में लाना चाहिए जिसमें स्पष्ट रूप से यह प्रावधान हो कि संसद के लिए निर्धारित काम के प्रतिशत के वास्तविक प्राप्त प्रतिशत के अनुसार ही माननीयों को वेतन और भत्ते दिए जायेंगें पर संभवतः सुधार के बड़े-बड़े दावे करने वाले पीएम भी इतना साहस कभी भी नहीं जुटा पायेंगें. क्या दुनिया की सबसे बड़ी कम्प्यूटर कम्पनियों के सीईओ भी तीन लाख रुपयों के लैपटॉप पर काम करते हुए दिखाई देते हैं इस बात की खोज लेना सरकार ने भी ज़रूरी नहीं समझा पर इतनी बड़ी राशि का बोझ अचानक से ही जनता पर डाल दिया है. अच्छा होता कि सभी माननीयों को यह सुविधा देने के लिए सीधे केंद्र सरकार द्वारा पहल की जाती और जितना काम हमारे माननीयों को करना होता है उसके लिए तीस हज़ार का कोई भी लैपटॉप काम कर सकता है उसकी खरीद के बारे में केंद्र सरकार को खुद ही कदम उठाना चाहिए था. देश में संसाधनों का रोना रोने वाली सरकार के पास लगभग ८०० सांसदों पर तीन लाख के हिसाब से खर्च करने के लिए २४०० करोड़ रूपये तो हैं पर उनसे किस तरह से काम लिया जाये यह उसे पता नहीं है.
सरकार को इस मसले पर गंभीरता के साथ विचार करने की आवश्यकता है क्योंकि आज भी अधिकांश माननीय ऐसे ही होंगें जिनको लैपटॉप से कोई मतलब ही नहीं है फिर इस तरह से इतनी धनराशि खर्च करने का क्या औचित्य है ? २४ करोड़ रूपये वैसे तो देश के लिए ज़्यादा नहीं होते पर इसका अंदाज़ा लगाने के लिए यह जाना जा सकता है कि रेलवे ने संभवतः १५ करोड़ रूपये खर्च करके ही २०१४ में अपने आईआरसीटीसी सर्वर को अपग्रेड किया था. इससे तो अच्छा यह होता की हर ज़िले की एनआईसी में ही माननीयों को एक सीट उपलब्ध कर दी जाती जहाँ पर बैठकर वे अपने काम को आसानी से कर पाते और सरकार पर कोई बोझ भी नहीं पड़ता. क्या इस तरह की धनराशि को सही तरह से उपयोग में लाते हुए सरकार को आगे नहीं बढ़ना चाहिए ? अभी हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकारों को एक वर्ष के अंदर सभी पुलिस थानों में सीसीटीवी लगाने के आदेश जारी किये हैं यदि इस तरह से इस धनराशि का उपयोग उसमें कर दिया जाये तो क्या देश को एक बड़ा उपहार नहीं मिल सकता है ? क्या माननीयों की विकास निधि से ही उनके क्षेत्र के हर थाने के लिए यह धनराशि जारी नहीं की जा सकती है जिससे कोर्ट के निर्देशों का सही समय से अनुपालन हो सकेगा और जनता को भी बड़ी राहत मिल सकेगी. पर आज देश को संभवतः केवल नारों की राजनीति में उलझाने और देश से जुड़े हर मुद्दे पर बवाल करने पर अपने हितों से जुड़े हर मुद्दे को आसानी से बिना किसी शोर शराबे के करने में हमारे राजनैतिक तंत्र को अब अधिक आसानी महसूस होने लगी है.
लैपटॉप मामले में सबसे हास्यास्पद बात तो यह भी सामने आई है कि पिछली बार जिन सांसदों को यह लैपटॉप दिए गए थे आज उनके पते ही लोकसभा सचिवालय को खोजने से नहीं मिल रहे हैं ? क्या इस तरह की बातें करने वाले लोगों से कोई यह पूछने वाला है कि जब उन सांसदों के पते नहीं मिल रहे हैं तो उनकी पेंशन कौन पा रहा है या वह किसे दी जा रही है ? स्पष्ट है कि इस मामले में सरकार की कमज़ोर इच्छाशक्ति ही सामने आ रही है क्योंकि जब भी इस तरह की रेवड़ियां बांटी जाती हैं उनके बारे में कोई सबूत नहीं मिलता है. अच्छा हो कि इस तरह के मद की अलग से व्यवस्था करने के स्थान पर सांसदों को सीधे ही यह सब उपलब्ध करा दिया जाये और यह उनके वेतन से कटौती करके ही पूरा किया जाये क्योंकि जिस तरह से उनको वहां के लिए सुविधाएँ दी जाती हैं तो उसी तरह उन्हें अन्य सुविधाएँ भी उनकी निश्चित रकम से ही दी जानी चाहिए. संसद में विपक्ष में चाहे जो भी दल बैठा हो पर अपने वेतन और भत्तों को बढ़ाने के लिए उनको सरकार से सहयोग करने में कभी भी शर्म नहीं आती है बाकि चाहे जिस मुद्दे पर उनका विरोध सामने आ जाये पर इस मुद्दे पर सभी मेजें थपथपाकर उस प्रस्ताव का एकमत से समर्थन कर देते हैं.
अब समय आ गया है कि इस तरह के अनावश्यक खर्चों से बचने के साथ “काम नहीं तो वेतन नहीं” को संसद और विधान सभाओं में लागू करने के लिए एक संविधान संशोधन लाया जाये जिससे माननीयों की इस तरह की अराजकता पर लगाम लगायी जा सके तथा उन पर भी काम करने का दबाव बनाया जा सके. संसद को अपने पूर्व निर्धारित समय के अनुसार बहस आदि न कर पाने पर सीधे तौर पर १०% भत्तों में कटौती का प्रावधान होना चाहिए और कुल समय का २५% से अधिक समय यदि हो हल्ले में जाता है तो भत्तों को आधा कर दिया जाना चाहिए. देश की जनता ने इन लोगों को काम करने के लिए भेजा है न कि किसी और काम के लिए सदन चलना सरकार की पहली और विपक्ष की दूसरी ज़िम्मेदारी है पर जो लोग १० वर्षों तक हल्ला मचा चुके हैं आज उन्हें सदन न चल पाने कीमत का अंदाज़ा होने लगा है फिर भी विपक्ष के इस तरह के आचरण का किसी भी स्तर पर समर्थन नहीं किया जा सकता है. माननीयों को यह समझना ही चाहिए कि देश है तो वे हैं १९४७ से हज़ारों माननीयों को यह देश और संसद देख चुके हैं अपने आचरण और व्यवहार को अब सँभालने का समय आ चुका है वर्ना जनता को सब दिखाई देता है और वह मौका मिलने पर कोई चूक भी नहीं करती है.

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