***.......सीधी खरी बात.......***

!!!!!!!!!!!! मेरी हर धड़कन भारत के लिए है !!!!!!!!!!

2,131 Posts

515 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 488 postid : 954326

धार्मिक स्वतंत्रता कहाँ तक ?

  • SocialTwist Tell-a-Friend

हमारे देश में जहाँ न्याय की आस में आज भी करोड़ों लोग अदालतों के चक्कर लगाने को मजबूर हैं वहीं कुछ मसले ऐसे भी हैं जिन्हें केवल अनावश्यक रूप से ही विवाद में घसीटने की कोशिशें की जाती हैं. एआईपीएमटी की परीक्षा में नकल रोकने के लिए जिस तरह से सुप्रीम कोर्ट ने कड़े निर्देशों के चलते यह परीक्षा दोबारा करवाने का आदेश जारी किया था उसमें से कुछ प्रावधानों को लेकर मामले को धार्मिक स्तर तक घसीटा भी गया और उसके बाद यह सारे मामले सुप्रीम कोर्ट तक भी पहुंच गए. एक विशेष तरह के ड्रेस कोड को लागू करने के आदेश के बाद कोर्ट में हिजाब पहनने के समर्थन में याचिकाएं भी दायर की गई जिसके निपटारे के जवाब में कोर्ट ने स्पष्ट रूप से यह कह दिया कि यह कोई मुद्दा ही नहीं है और केवल अहम से जुड़ा हुआ मामला है. तीन घंटे की परीक्षा में बिना प्रतीक स्वरूप पहने जाने वाले कुछ कपड़ों के न होने से आस्था पर कोई संकट नहीं आने जा रहा है और कोर्ट ने स्पष्ट रूप से यह भी कह दिया कि आप निश्चिंत होकर परीक्षा दीजिये कुछ भी नहीं होने जा रहा है.
देश का संविधान सभी को धार्मिक आज़ादी की पुरज़ोर वकालत करता है पर यह धार्मिक आज़ादी किस स्तर तक दी जा सकती है इस पर संविधान ने कुछ भी कहने से मना कर दिया है. यह सारा मामला केवल लोगों के विवेक पर ही छोड़ दिया गया है कि वे इस मिली हुई आज़ादी का किस तरह से उपयोग करते हैं पर सिर्फ कड़े निर्णयों में कुछ विवाद खड़े करने के मक़सद से ही जिस तरह से इस मामले को उछाला गया वह निश्चत रूप से सही नहीं कहा जा सकता है क्योंकि देश के लोगों को यह आज़ादी देश की संविधान सभा के उन उदारपंथी लोगों ने दी थी जो सभी के साथ सद्भाव चाहते थे पर क्या किसी भी धर्म या समूह को यह आज़ादी दी जा सकती है कि वो अपने अनुसार देश के कानून और विशेष आदेशों को भी सीधे अपनी आस्था से जोड़ने का काम शुरू कर दें ? कुछ राज्यों की सरकारों की तरफ से ऐसी ढील दिए जाने का परिणाम ही आज इस रूप में दिखाई देने लगा है पर प्रधान न्यायाधीश दत्तू के स्पष्टीकरण के बाद अब भविष्य में इस तरह के मामलों को अदालत में चुनौती देने का दरवाज़ा फिलहाल बंद ही हो गया है. कोर्ट के कड़े रुख के कारण ही याचिकाकर्ता ने अपनी याचिका वापस लेने की मांग भी कर दी जिसे स्वीकार कर लिया गया.
कोर्ट के इस तरह के स्पष्ट और कठोर आदेश के बाद एक बात हम सभी को समझनी ही होगी कि देश में धार्मिक आज़ादी का मतलब यह कतई नहीं होना चाहिए कि हम अपनी धार्मिक गतिविधियों को देश के कानून से भी ऊपर समझने लगें क्योंकि आज धर्म का जो स्वरुप पूरे देश में दिखाई देता है उसकी कल्पना किसी ने भी नहीं की थी. धर्म जब कानून और व्यवस्था के लिए चुनौती बनने लगेगा तो आने वाले समय में कभी कोर्ट यह भी कह सकती है कि धर्म का प्रदर्शन व्यक्तिगत मामला है और प्रशासनिक कार्यो में इसे घुसपैठ करने की छूट नहीं दी जा सकती है. आखिर क्यों हम अपनी धार्मिक आज़ादी के नाम पर देश के कानून को चुनौती देने की कोशिश करना शुरू करें जिससे आने वाले समय में इस मिली हुई आज़ादी के पर कतरने का काम भी कोर्ट द्वारा ही कर दिया जाये क्योंकि नेता तो अपने वोटों के लालच में समाज की हर बुराई का समर्थन करने को तैयार ही बैठे रहते हैं. इस मसले को कोर्ट ने अहम से जुड़ा मसला बताते हुए एक तरह से पूरे समाज को ही आइना दिखा दिया है जिसे किसी धर्म विेशेष से जोड़ने की आवश्यकता भी नहीं है क्योंकि आने वाले समय में यदि कोई इस तरह से कोर्ट जाने का प्रयास करता है तो उसे वहां से कड़ी फटकार मिलने की संभावनाएं ही दिखाई देने लगी हैं.

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (No Ratings Yet)
Loading ... Loading ...

0 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments


topic of the week



latest from jagran